गायत्री मंत्र का तत्वज्ञान

शरीरस्थ २४ ग्रंथियाँ और उनकी शक्तियाँ

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पिण्ड को ब्रह्माण्ड की छोटी प्रतिकृति माना गया है ।। वृक्ष की सारी सत्ता छोटी से बीज में भरी रहती है। सौर मण्डल की पूरी प्रक्रिया छोटे से परमाणु में ठीक उसी तरह काम करती देखी जा सकती है ।। मनुष्य की शारीरिक और मानसिक संरचना का छोटा रूप शुक्राणु में विद्यमान रहता है ।।

यह 'महतोमहीयान् का अणोरणीयान्' में दर्शन है ।। छोटी- सी 'माइक्रो' फिल्म पर सुविस्तृत ग्रंथों का चित्र उतर आता है ।। जीव में ब्रह्म की सारी विभूतियाँ और शक्तियाँ विद्यमान है ।। ब्रह्म का विस्तार यह ब्रह्माण्ड है ।। जीव का विस्तार शरीर में है ।। मानवी- काया यों हाड़- माँस की बनी दीखती है और मलमूत्र की गठरी प्रतीत होती है, पर उसकी मूल सत्ता, जो गंभीर विवेचन करने पर प्रतीत होती है, वह है, जिससे इस छोटे से कलेवर में वह सब विद्यमान मिलता है, जो विराट् विश्व में दृष्टिगोचर होता है ।।

स्थूल दृष्टि से स्थूल का दर्शन होता है और सूक्ष्म से सूक्ष्म का ।। चर्म- चक्षुओं से सीमित आकार- प्रकार- दूरी की वस्तुएँ देखी जा सकती हैं ।। शक्तिशाली माइक्रोस्कोप अदृश्य वस्तुओं को भी दृश्य रूप में प्रस्तुत कर देते हैं ।। दूर्बिनों से वे दूरवर्ती वस्तुएँ दीखती हैं, जिन्हें साधारण दृष्टि से देख सकना संभव नहीं है ।। ज्ञान चक्षुओं से सूक्ष्म जगत् की स्थिति को भली प्रकार जाना जा सकता है ।। अर्जुन को, यशोदा को भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञान चक्षुओं से ही अपने विराट् रूप का दर्शन कराये थे ।। उसी माध्यम से राम के वास्तविक रूप का साक्षात्कार कौशिल्या और काकभुसुण्डि को हुआ था ।। उसी दृष्टि से देख सकना जिस किसी के लिए भी संभव हुआ है, वह अपनी ही मानवी काया में देव शक्तियों की उपस्थिति सत्प्रवृत्तियों के रूप में स्पष्टतया देखता है ।। प्रसुप्त स्थिति में तो जीवित मनुष्य भी मृतकवत पड़ा रहता है, पर जागृति की स्थिति में पहुँच कर वही प्रबल पुरुषार्थ करता और अपनी प्रखरता का परिचय देता है ।। मानवी काया वन- मानुष के नर- वानर के समतुल्य इस लिए बनी रहती है कि उसकी देवात्मा प्रसुप्त स्थिति में पड़ी होती है ।। साधना, उपचारों की सहायता से जो उसे जगा लेते हैं, उन्हें दिव्य शक्ति सम्पन्न सिद्ध पुरुष बनने में देर नहीं लगती ।।
मानवी सत्ता में देवशक्तियों की उपस्थिति का वर्णन करते हुए भगवान् शिव, पार्वती के सम्मुख रहस्योद्घाटन करते हैं ।।
देहेऽस्मिन् वर्तते मेरुः सप्त द्वीप समन्वितः ।।
सरितः सागराः शैलाः क्षेत्राणि क्षेत्र पालकाः॥
ऋषियो मुनयः सर्वे नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ।।
पुण्य तीर्थानि पीठानि वर्तन्ते पीठ देवताः॥
सृष्टि संहार कर्तारौ भ्रमन्तौ शशिः भास्करौ ।।
नभो वायुश्चय बह्निश्च जलं पृथ्वीः तथैव च॥
त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वाणि देहतः ।।
मेरुं संवेष्ट्य सर्वत्र व्यवहारः प्रवर्तते॥
जानाति यः सर्वमिदं त योगी नात्र संशयः ।।
ब्रह्माण्ड संज्ञके देहे यथा देशं व्यवस्थितः॥ -शिव संहिता (२/१- ४)

अर्थात् इसी देह में मेरु, सप्त द्वीप, सरिता, सागर, शैल, क्षेत्र पालक, ऋषि, मुनि, नक्षत्र, ग्रह, पीठ, पीठ देवता, शिव, चन्द्र, सूर्य, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, तीनों लोक, सब प्राणि निवास करते हैं ।। जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में है ।। इस रहस्य को जो जान सकता है वही योगी है ।।
मनुष्य शरीर में अनेक विलक्षण शक्तियाँ सन्निहित हैं, यह तथ्य अब वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं ।। यह शक्तियाँ शरीर में कुछ केन्द्रों- ग्रंथियों से संचालित होती हैं ।। गायत्री का हर अक्षर किसी न किसी महत्त्वपूर्ण शक्ति केन्द्रों को प्रभावित करता है ।। जैसे टाइपराइटर की चाभियों पर उँगली रखने से निश्चित अक्षर छपते हैं, उसी प्रकार निश्चित शब्दों का प्रभाव शरीरस्थ शक्ति केन्द्रों पर पड़ता है ।। गायत्री मंत्र के हर अक्षर से सम्बन्धित ग्रंथियों और उनकी शक्तियों की तालिका यहाँ दी जा रही है ।।
२४ अक्षरों से सम्बन्धित २४ ग्रंथियों एवं २४ शक्तियों के नाम इस प्रकार हैं-
क्र.सं.अक्षर ग्रंथि का नाम उसमें भरी हुई शक्ति
(१) त त्तापिनी सफलता
(२) स सफलता पराक्रम
(३) वि विश्वा पालन
(४)तु रतुष्टि कल्याण
(५)व वरदा योग
६)रे रेवती प्रेम
७)णि सूक्ष्मा धन
८)यं ज्ञाना तेज
९)भ र्भर्गा रक्षा
१०)गो गोमती बुद्धि
११)दे देविका दमन
१२)व वराही निष्ठा
१३)स्य सिंहनी धारणी
१४)धी ध्यान प्राण
१५)म मर्यादा संयम
१६)हि स्फुटा तप
१७)धि मेधादूर दर्शिता
१८)यो योगमाया जागृति
१९)यो योगिनी उत्पादन
२०)नः धारिणी सरसता
२१)प्र प्रभवा आदर्श
२२)चो ऊष्मा साहस
२३)द दृश्या विवेक
२४)या त्निरंजना सेवा

गायत्री उपरोक्त २४ शक्तियों को साधक में जागृत करती है ।। यह गुण इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि इनके जागरण के साथ- साथ अनेक प्रकार की सफलताएँ, सिद्धियाँ और सम्पन्नता प्राप्त होना आरंभ हो जाता है ।। गायत्री साधना कोई अन्ध विश्वास नहीं, एक ठोस वैज्ञानिक कृत्य है और उसके द्वारा लाभ भी सुनिश्चित ही होते हैं ।। इसलिए शास्त्रों में इसे भूलोक की कामधेनु कहा गया है ।।

मंत्र विद्या के वैज्ञानिक जानते हैं कि जीभ से जो भी शब्द निकलते हैं, उनका उच्चारण कण्ठ, तालु, मूर्धा, ओष्ठ, दन्त, जिह्वामूल आदि मुख के विभिन्न अंगों द्वारा होता है ।। इस उच्चारण काल में मुख के जिन भागों से ध्वनि निकलती है, उन अंगों के नाड़ी, तन्तु शरीर के विभिन्न भागों तक फैलते हैं ।। इस फैलाव क्षेत्र में कई ग्रंथियाँ होती हैं, जिन पर उन उच्चारण का दबाव पड़ता है ।। जिन लोगों की कोई सूक्ष्म ग्रंथियाँ रोगी या नष्ट हो जाती हैं, उनके मुख से कुछ खास शब्द अशुद्ध या रुक- रुक कर निकलते हैं, इसी को हकलाना या तुतलाना कहते हैं ।। शरीर में अनेक छोटी- बड़ी, दृश्य- अदृश्य ग्रंथियाँ होती हैं ।। योगी लोग जानते हैं कि उन कोशों में कोई विशेष शक्ति- भण्डार छिपा रहता है ।। सुषुम्ना से सम्बद्ध षट्चक्र प्रसिद्ध है, ऐसी अगणित ग्रंथियाँ शरीर में है ।। विविध शब्दों का उच्चारण इन विविध ग्रंथियों पर अपना प्रभाव डालता है और उस प्रभाव से उन ग्रंथियों का शक्ति भण्डार जागृत होता है ।। मंत्रों का गठन इसी आधार पर हुआ है ।। गायत्री मंत्र में २४ अक्षर हैं ।। इसका सम्बन्ध शरीर में स्थित ऐसी २४ ग्रंथियों से है जो जागृत होने पर सद्बुद्धि प्रकाशक शक्तियों को सतेज करती है ।। गायत्री मंत्र के उच्चारण से सूक्ष्म शरीर का सितार २४ स्थानों से झंकार देता है और उससे एक ऐसी स्वर- लहरी उत्पन्न होती है, जिसका प्रभाव अदृश्य जगत् के महत्त्वपूर्ण तत्त्वों पर पड़ता है ।। यह प्रभाव ही गायत्री साधना के फलों का प्रभाव हेतु है ।।

षट्चक्र प्रख्यात हैं ।। उनके अतिरिक्त २४ विशिष्ट और ८४ सामान्य शक्ति- केन्द्र भी इस शरीर में विद्यमान हैं ।। इन्हें उपत्यिकाएँ और विभेदिकाएँ कहते हैं ।। २४ उपत्यिकाएँ छोटे- छोटे षट्चक्रों जैसे शक्ति संस्थान ही हैं ।। यह शरीर के विभिन्न स्थानों पर विद्यमान हैं ।। गायत्री महामंत्र में २४ अक्षर जब स्पन्दित होते हैं, तब मुख में उत्पन्न हुई गतिविधियों का सूक्ष्म प्रभाव उन उपत्यिकाओं पर पड़ता है और वे स्वसंचालित हलचल बनकर उन्हें प्रस्तुत स्थिति से जागृत स्थिति में परिणत करने का कार्य आरंभ कर देती हैं ।। अधिक जप करने की निरन्तर चल रही प्रक्रिया पत्थर पर घिसने वाली रस्सी की तरह प्रभाव डालती रहती है और वे संस्थान जैसे- तैसे अपनी मच्ूर्छा दूर करके चेतन- भूमिका में आते जाते हैं, वैसे- वैसे इस उपासना में संलग्न व्यक्ति अपने आपको अलौकिक शक्तियों से सुसम्पन्न अनुभव करता हुआ आत्म- विकास की ओर बढ़ता चला जाता है ।।

किस संस्थान में किस देव शक्ति का निवास है और वहाँ कौन- सी विशिष्ट शक्ति छिपी पड़ी है ।। शरीर से किस स्थान पर कौन उपत्यिका उपस्थित है और गायत्री मंत्र का कौन- सा अक्षर उसे प्रभावित करने का प्रयोजन पूर्ण करता है, इसका उल्लेख शास्रकारों ने संकेत रूप से किया है ।। न्यास, कवच, रक्षा विधान आदि के माध्यम से पूजा- प्रार्थना करते हुए यह अनुभव किया जाता है कि इस स्थान पर विद्यमान अमुक शक्ति का नव जागरण हो रहा है, उस केन्द्र पर ब्रह्माण्ड में संव्याप्त दिव्य कामनाओं का अवतरण हो रहा है ।। स्थापना, श्रद्धा, अनुभूति एवं उपलब्धि के चार चरण ध्यान- धारणा में प्रयुक्त होते हैं ।। यह संगति इन उपचारों के सहारे भली प्रकार बैठ जाती है ।। फलतः न्यास, कवच, रक्षाविधान आदि कृत्यों के माध्यम से शरीर में देवशक्तियों के जागरण एवं अवतरण का द्वार खुल जाता है ।।


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