धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म भाग 6

आधुनिक मनोविज्ञान ने परम्परागत अध्यातम के इस अनुभव की पुष्टि कर दी है की मानवीय - चेतना विविध स्तरों पर एक साथ क्रियाशील रहती है | उन सभी स्तरों पर सक्रीय जीवन अपने आप में अखण्ड है | जीवन को विभाजित रूप में नही देखा -समझा जा सकता | चेतना किस क्षेत्र में किस रूप में सक्रीय होगी , यह इस पर निर्भर है की उस क्षेत्र किन प्रवृत्तियों  के प्रति उसकी आस्था है | अतः स्पष्ट होता है की चेतना की क्रियाशीलता का स्वरूप मुख्यतः आस्था से निर्धारित ,निर्देशित होता है | यह बात जितनी अन्य क्षेत्रो के लिए लागु होती है , उतनी ही धर्मतंत्र के लिए भी |धर्मतंत्र भी उसी स्थिति  में कल्याणकारी ,उपयोगी और श्रेयप्रद होता है ,जब उसके साथ प्रतिपादित जीवन मूल्यों  में गहनआस्था हो |जब आस्था उन जीवन मूल्यों में न होकर स्वयं को धार्मिक कहलाने- दिखलाने और लोक - श्रद्धा को ठगने  फुसलाने में हो जाती है तो वही धर्मतंत्र हानिकर ,विकृत पतनकारक  भी बन जाता है |

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