दीक्षा और उसका स्वरूप

दीक्षा— एक शपथ-एक अनुबन्ध

<<   |   <   | |   >   |   >>
    जो मनुष्य का जीवन मिला है, उसको हम भूलेंगे नहीं। अब हम हिम्मत के साथ उसके सामने कदम बढ़ायेंगे। जैसे पहली बार अन्न खाया जाता है, उस दिन अन्नप्राशन का उत्सव मनाया जाता है। उसी प्रकार से जिस दिन प्रतिज्ञामय जीवन जीने की कसम खाई जाती है, शपथ खाई जाती है कि हमारा मुख इस ओर मुड़ गया और हम अपने कर्तव्यों की ओर अग्रसर होने को कटिबद्ध हो गये हैं ; उसकी जो प्रतिज्ञा की जाती है, उसकी जो शपथ ली जाती है, उस शपथ का नाम दीक्षा समारोह है, दीक्षा उत्सव है, दीक्षा संस्कार है। शपथ ली जाती है कि हम अपने आपको उससे यह प्रकृति के साथ नहीं, वासना के साथ नहीं, तृष्णा के साथ नहीं, बल्कि अपने को अपनी जीवात्मा के साथ जोड़ते हैं और अपने मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को अपनी आत्मा के साथ जोड़ते हैं। अपनी क्रियाशीलता और सम्पदा को अपनी आत्मा के साथ जोड़ते हैं। आत्मा का अर्थ परमात्मा जो कि शुद्ध और परिष्कृत रूप से हमारे अंतःकरण में बैठा हुआ है।    

    हम अपने अन्तरंग की पुकार को सुनें और संकल्प करें कि अपनी जीवात्मा को जो हमारा वास्तविक स्वरूप है, सुखी व समुन्नत बनाने के लिए अपनी बाह्य और भौतिक शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे। हमारे पास शारीरिक शक्ति है, हम अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए उस शारीरिक शक्ति को खर्च करेंगे। हमारे पास बुद्धि है, हम उस बुद्धि को अपने जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने में खर्च करेंगे। हमारे पास जो धन है, उसे हम अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए खर्च करेंगे। हमारा जो प्रभाव, वर्चस् संसार में है, उससे अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए खर्च करेंगे।    

    जीवात्मा को सुखी और समुन्नत कैसे बनाया जा सकता है? यह कई बार बताया जा चुका है और हजार बार बताया जाना चाहिए। उसके सिर्फ दो ही रास्ते हैं। एक रास्ता यह कि मनुष्य शुद्ध और निर्मल जीवन जिये। निर्मल जीवन जीने से आदमी की अपार शक्ति का उदय होता है। आदमी की सारी शक्ति का जो क्षय हो रहा है, वह नष्ट हो रही है, आदमी जो छोटा बना हुआ है, कमीना बना हुआ है, शक्तिहीन बना हुआ है दुर्बल बना हुआ है, इसका कारण एक ही है कि मनुष्य ने अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को छोटे किस्म का बनाया हुआ है।    

    अगर आदमी अपनी गतिविधियों को छोटे किस्म का बना कर न रखे, ऊँचे किस्म का बनाकर रखे, अपने आचरण ऊँचे रखे, अपनी इन्द्रियों के ऊपर संयम रखे, अपनी वाणी पर संयम रखे और अपने विचारों पर संयम रखे ; तब वह आदमी छोटा नहीं हो सकता। तब आदमी के अन्तरंग में दबी हुई शक्तियाँ दबी हुई नहीं रह सकतीं। मामूली- सा आदमी क्यों न हो, लेकिन उसकी भी वाणी इतनी प्रभावशाली हो सकती है कि मैं क्या कह सकता हूँ? उसका सोचने का तरीका कितना उत्कृष्ट हो सकता है कि मैं उससे क्या कहूँ? आदमी का प्रभाव इतना ज्यादा हो सकता है और आदमी के अन्तरंग में इतनी शान्ति हो सकती है कि उस शान्ति को वह चाहे, तो लाखों मनुष्यों पर बिखेर सकता है। उसकी वाणी में वह सामर्थ्य हो सकती है कि अपनी वाणी के प्रभाव से न केवल मनुष्यों को बल्कि दूसरे जीव- जन्तुओं को भी प्रभावित कर सकता है।    

    अगर आदमी अपनी वासना और तृष्णा पर काबू कर ले, तब उसका मस्तिष्क तेज हो जाता है। वह एकान्त में बैठा है, तब भी उसके विचार सारी दुनिया में व्याप्त हो सकते हैं। अगर आदमी अपना जीवन निर्मल जिए। सारी दुनिया के विचारों से टक्कर लेने और उन्हें ऊँचा उठाने में समर्थ हो सकता है।
<<   |   <   | |   >   |   >>

Write Your Comments Here: