दीक्षा और उसका स्वरूप

दीक्षा क्या? किससे लें ?

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बस यही मनुष्यता की दीक्षा और मनुष्यता की ऊपरी परिधि में प्रवेश करने का शुभारंभ है। इसी का नाम अपने यहाँ गायत्री मंत्र की दीक्षा है। ये दीक्षा आवश्यक मानी गई है और दीक्षा ली जानी चाहिए। लेकिन दीक्षा के लिए व्यक्ति का कोई उतना ज्यादा महत्त्व नहीं है। व्यक्ति जब दीक्षा देता है, अपने आप को व्यक्ति गुरु बनाता है और अपने शरीर के साथ में शिष्य के शरीर को जोड़ने लगता है, तो उसका नाम गुरूडम है। गुरुडम का कोई मूल्य नहीं है।  गुरुडम से नुकसान भी है। यदि व्यक्ति समर्थ नहीं है, शुद्ध और पवित्र नहीं है और निर्लोभ नहीं है और उसकी आत्मा उतनी ऊँची उठी हुई नहीं है, घटिया आदमी है; तब उसके साथ में सम्बन्ध मिला लिया जाए, तो वह शिष्य भी उसी तरह का घटिया होता हुआ चला जाएगा। गुरु का उत्तरदायित्त्व उठाना सामान्य काम नहीं है। गुुरु दूसरा भगवान् का स्वरूप है और भगवान् के प्रतीक रूप में सबसे श्रेष्ठ जो मनुष्य हैं, व्यक्तिगत रूप से सिर्फ उन्हें ही दीक्षा देनी चाहिए, अन्य व्यक्तियों को दीक्षा नहीं देनी चाहिए।

    उन्हें (दीक्षा देने वालों को) भगवान् के साथ सम्बन्ध मिला देने का काम करना चाहिए। विवाह सिर्फ उसी आदमी को करना चाहिए, जो अपनी बीबी को प्यार देने और उसके लिए रोटी जुटाने में समर्थ है। विवाह संस्कार तो कोई भी करा सकता है, पण्डित भी करा सकता है। दक्षिणा दे करके विवाह करा ले, बात खतम। लेकिन पण्डित जी कहने लगे कि इस लड़की से जो एम.ए. पास है और जो पीएच. डी. है, मैं ब्याह करूँगा। लेकिन उसके लिए अपने  पास जवानी भी होनी चाहिए, पैसे भी होने चाहिए, अनेक बातें होनी चाहिए। अगर ये सब न हों, तो कोई लड़की कैसे ब्याह करने को तैयार हो जाएगी? दीक्षा को एक तरह का आध्यात्मिक विवाह ही कहते हैं। आध्यात्मिक विवाह करना हर आदमी के वश की बात नहीं है। बीबी का पालन करना, बच्चे पैदा करना और बीबी की रखवाली करना हरेक का काम है क्या? नहीं, हरेक का काम नहीं है।

    व्यक्तिगत रूप से (गुरु बनकर) दीक्षा देना भी सम्भव है  लेकिन वह हर आदमी का काम नहीं है। जिस आदमी के पास इतना प्राण तत्त्व और इतना उत्कृष्ट जीवन और इतना अटूट आत्मबल न हो; जो अपने आत्मबल की सम्पदा में से, अपने तप की पूँजी में से, अपने ज्ञान की राशि में से, दूसरों को महत्त्वपूर्ण अंश देने में समर्थ न हो, ऐसे आदमी को दीक्षा नहीं देनी चाहिए और न ऐसों से किसी को दीक्षा लेनी चाहिये। यदि उनसे  लिया गया है, तो उससे हानि भी हो सकती है। मान लीजिए कोई पति तपेदिक का बीमार है या सिफिलिस का बीमार है या सुजाक का बीमार है, उसके साथ में बीबी ब्याह कर ले, तो जहाँ पति रोटी कमाकर के खिला सकता है, वहाँ उसकी वह बीमारियाँ भी उसकी पत्नी में आ जायेगी और उसका जीवन चौपट हो जायेगा।

बिना समझे-बूझे कोई भी आदमी आजकल दीक्षा देने लगते हैं, ताकि रुपया-अठन्नी का ही लाभ होने लग जाय और पैर पुजाने का लाभ होने लगे और अपना गुजारा चलने लगे और फोकट का सम्मान भी मिलने लगे। ये बहुत ही बेहूदी बात है और इस तरह  की हिम्मत जो आदमी करते हैं, वे बहुत ही जलील आदमी हैं। ऐसे जलील आदमियों को इस समाज में से  एक कोने में उठाकर फेंक देना चाहिए। दीक्षा के लिए कोई आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति से ही दीक्षा ली जाए। कोई जरूरी नहीं है। दीक्षा का अर्थ प्रतिज्ञा है। दीक्षा का अर्थ वह होता है कि किसी आदमी के साथ जुड़कर के उसकी तपश्चर्या, उसका ज्ञान और उसके आत्मबल की सम्पदा का व्यक्तिगत रूप से लाभ उठाया जाए, ये भी एक तरीका है; लेकिन मैं देखता हूँ  कि आज ऐसे आदमी दुनिया में लगभग नहीं हैं।

    योग विशेष से सैकड़ों वर्ष पीछे कोई-कोई ही ऐसे आदमी पैदा होते हैं। वह पैदा होते हैं, जिनके पास वशिष्ठ जैसा ज्ञान और विश्वामित्र जैसा तप दोनों का समुचित रूप से समन्वय हो और यदि इन दो आवश्यकताओं को पूरा करने वाला नहीं है, तो निरर्थक है। उसकी दीक्षा से कोई फायदा नहीं है, बल्कि और भी अज्ञान फैल सकता है। दूसरे और भी आदमियों को चालाकी और धूर्तता करने का मौका मिल सकता है।

    मैं समझता हूँ कि अभी फिलहाल की जो परिस्थितियाँ हैं , उनमें किसी आदमी को किसी व्यक्ति से दीक्षा नहीं लेनी चाहिए। बल्कि सिर्फ भगवान् के साथ, आत्मा के साथ, परमात्मा के साथ ब्याह करना चाहिए और अपनी जीवात्मा को भगवान् के साथ भगवान् के कार्यों में करने के लिए एक संकल्प और प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। विवाह के समय भी यों ऐसे ही स्त्री-पुरुष साथ रहने लगें, तो कोई हर्ज नहीं है। लेकिन विवाह होता है, सामाजिक रूप में होता है, उत्सव के साथ में होता है, तो दोनों की- स्त्री-पुरुष के मन पर एक छाप पड़ जाती है कि हमारा नियमित और विधिवत् विवाह हुआ था।  इसी तरह किसी आदमी ने अपने जीवन में कोई प्रतिज्ञा ली है, उसके ऊपर कोई उसकी मनोवैज्ञानिक छाप हमेशा के लिए पड़ जाती है। शपथ लेने की याद बनी रहती है। दीक्षा लेना एक शपथ लेने के बराबर है। हमने क्या ली शपथ? दीक्षा के दिन हमने ये शपथ लीकि हम मनुष्य का जीवन जियेंगे और मनुष्य के सिद्घान्त और मनुष्य के आदर्शों को ध्यान में रखेंगे।

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