भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व

पारिवारिक स्वराज्य

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'अनावश्यक संकोच' पारिवारिक कलह की वृद्धि में सबसे प्रधान कारण है ।। बाहर के आदमियों से हो हम घुल- घुल कर बात करते हैं, परन्तु घर वालों से सदा उदासी रहते हैं, बहुत ही संक्षिप्त वार्तालाप करते हैं ।। बहुत कम परिवार ऐसे देखे जाते हैं जिनमें घर के लोग एक दूसरे से अपने मन की बातें कह सकें ।। शिष्टाचार, बड़प्पन, लिहाज, लाज, पर्दा आदि का वास्तविक रूप नष्ट होकर उसका ऐसा विकृत स्वरूप बन गया है कि घर के सब लोग अपनी- अपनी मनोभावनाएँ आवश्यकताएँ एवं अनुभूतियाँ एक- दूसरे के सन्मुख रखते हुए झिझकते हैं ।। इस गलती का परिणाम यह होता है कि एक- दूसरे को ठीक तरह समझ नहीं पाते । किसी बात पर मतभेद हो तो उस भेद को अवज्ञा, अपमान या विरोध मान लिया जाता है ऐसा न होना चाहिए ।।

किसी बात का निर्णय करना हो तो घर के सभी सलाह दे सकने के योग्य स्त्री- पुरुषों की सलाह लेनी चाहिए ।। अपने अभाव प्रकट करने का हर एक को अवसर दिया जाय ।। जो काम करना हो उसे इस प्रकार अच्छी भूमिका के साथ तर्क और उदाहरणों के साथ रखना चाहिए कि उस पर घर वालों की सहमति मिल जावे ।। हर व्यक्ति यह अनुभव करे कि मेरे आदेश से ही यह कार्य हुआ ।। जिस प्रकार राज्य संचालन में प्रजा की सहमति आवश्यक है उसी प्रकार गृह व्यवस्था में परिजनों की सहमति रहने में शान्ति और सुव्यवस्था रहती है ।। राजनीतिक स्वराज्य से देश में अमनो अमन कायम रहता है ।। पारिवारिक स्वराज्य से परिवार में सुव्यवस्था रहती है ।। परिवार की प्रजा यह न समझे कि किसी की इच्छा जबरदस्ती हमारे ऊपर थोपी जा रही है वरन् उसे यह भान होना चाहिए विनिमय और विवेक के साथ नीति निर्धारित की गई है तथा औचित्य एवं ईमानदारी को व्यवस्था संचालन में प्रधान स्थान दिया जा रहा है ।। इस सरल, स्वाभाविक और बिना किसी कठिनाई की नीति का जिस परिवार में पालन किया जाता है वहाँ सब प्रकार सुख शान्ति बनी रहती है ।।

सास बहुओं में, ननद भौजाइयों में देवरानी जिठानियों में अक्सर छोटी- मोटी बातों पर लड़ाई हुआ करती है ।। स्त्री जाति को मानसिक विकास के अवसर प्रायः कम ही उपलब्ध होते हैं, इसलिए उनकी उदारता संकुचित होती है ।। निस्संदेह पुरुष की अपेक्षा आत्म- त्याग और स्नेह मात्रा की स्त्रियों में बहुत अधिक होती है, पर वह अपने बच्चे या पति में अत्यधिक लग जाने के कारण दूसरों के लिए कम बचती है ।। समझा- बुझा कर एक- दूसरे के लिये उदारता प्रकट करने का अवसर देकर उन्हें यह अनुभव होना चाहिए कि परिवार के सब सदस्य बिल्कुल निकटस्थ, बिल्कुल सगे हैं ।। विरानेपन या परायेपन की दृष्टि से सोचने की दुर्भावना को हटाकर आत्मीयता की दृष्टि से सोचने योग्य उनकी मनोभूमि को तैयार करना चाहिए ।। बड़े- बूढ़े यह आशा न करें कि हमारे साथ शिष्टाचार की अति बरती जानी चाहिये, उन्हें छोटों के प्रति क्षमा, उदारता, प्रेम और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए, दास, नौकर या गुलाम जैसा नहीं ।। इसी प्रकार छोटों को बड़ों के प्रति आदर- भाव रखना चाहिये, घरों की अन्य कामों की अपेक्षा पहले आवश्यकता और इच्छाओं को पूरा करना चाहिये । घर का काम धंधा आम तौर से बँटा हुआ रहना चाहिए ।। बीमारी, कमजोरी गर्भावस्था या अन्य किसी कठिनाई की दशा में दूसरों को उसका काम आपस में बाँटकर उसे हलका कर देना चाहिए ।।

नित्य पहनने के जेवरों को छोड़कर अन्य जेवर सम्मिलित रखे जा सकते हैं जिनका आवश्यकतानुसार सब उपयोग करलें ।। आपको यदि पैसे की सुविधा हो तो सबके लिये अलग- अलग भी जेवर बना सकते हैं पर वे सब के पास करीब -करीब समान होने चाहिए ।। नई शादी होकर आने वाली बहू के लिये अपेक्षाकृत कुछ अधिक चीजें होना स्वाभाविक है ।। विशेष अवस्था को छोड़कर साधारणतः सबका भोजन- वस्त्र करीब एकत्र ही होना चाहिये ।। इस प्रकार स्त्रियों में एकता रह सकती है ।।

गृहस्थ योगी को चाहिये कि अपने परिवार को सेवा- क्षेत्र बनावें ।। परिजनों को ईश्वर की प्रतिमूर्तियां समझकर उनकी सेवा में दत्तचित्त रहे, उन्हें भीतरी और बाहरी स्वच्छता से समन्वित करके सुशोभित बनाये ।। इस प्रकार अपनी सेवा- वृत्ति और परमार्थ- भावना का जो नित्य पोषण करता है, उसकी अन्तः चेतना वैसी ही पवित्र हो जाती है जैसे अन्य योग साधकों की ।। गृहस्थ योगी की वही सद्गति उपलब्ध होती है जिसे अन्य योगी प्राप्त करते है ।।
(भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व पृ.सं.४.१५६)

तचक्षुदेर्वहितं पुरस्ताच्छुक्रमुन्नरत् ।। पश्येम शरद: शतं जीवेम शरदः शतं श्रणुयाम शरदः शतं प्रव्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं, भूयश्चशरदः शतात्॥ (यजु. ३६,२४)

''वह परमात्मा देवों का हित करने वाला हो, (जो)'' अनादि और विशुद्ध ज्ञान का उपदेश करता है ।। हम सौ वर्ष के जीवन काल में उसका दर्शन कर सकें ।। सौ वर्ष के जीवन में इसी ध्येय के लिए जीवित रहें ।। सौ वर्ष तक के जीवन में हम इस परमात्मा का श्रवण और मनन करते रहें ।। सौ वर्ष तक के जीवन काल में हम इस परमात्मा का गुणगान गाते रहें ।। सौ वर्ष तक के जीवन में हम कभी भी दीनता वृत्ति प्रकट न करें ।। सौ वर्षों से यदि अधिक जीवन भी मिले, तब भी हम अपने जीवनकाल में उक्त कार्य करते रहें ।।

उक्त वेद मंत्र से ज्ञात होता है कि मनुष्य की आयु १०० वर्ष से कम नहीं वरन् अधिक ही है ।। इस सम्बन्ध में भारत के प्राचीन इतिहास का अवलोकन करने पर पता चलता है कि रामायण और महाभारत काल में मनुष्यों की आयु १०० वर्ष से अधिक आयु होती थी ।। महाभारत के अधिकतर पात्र १०० वर्ष से अधिक आयु के थे ।। यहाँ तक कि इच्छामृत्यु के भी उदाहरण मिलते हैं ।। तात्पर्य यह है कि मनुष्य की आयु १०० वर्ष है ।। ''शतापूर्वे पुरुषाः'' यह वेद भगवान् की साक्षी है ।। उस समय केवल सौ वर्ष की आयु ही नहीं होती थी वरन् जीवन की अन्तिम अवस्था तक शरीर में शक्ति, स्फूर्ति, तेज बने रहते थे ।।

हमारी सौ वर्ष की आयु और उसमें भी शक्ति, सामर्थ्य, तेज, ओज आदि होने का एक कारण यह था कि मानव- जीवन को बड़े सुव्यवस्थित एवं मर्यादापूर्ण नियम में बाँधा गया था, जिनको धार्मिक माध्यम से प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक निर्धारित किया गया ।। इनमें आश्रम व्यवस्था भी एक थी ।। भारतीय ऋषियों ने दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता पूर्वक आश्रम व्यवस्था बनाई थी ।। जीवन के चार भागों में विभक्त कर ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास इन चार आश्रम के विभिन्न धर्म- पालन करते हुए १०० वर्ष जीने का मार्ग प्रशस्त हुआ ।। इन चारों आश्रमों का यथाविधि पालन किया जाये तो मनुष्य को सौ वर्ष की आयु एवं सुंदर स्वास्थ्य, शक्ति, सामर्थ्य आदि की प्राप्ति हों ।। प्रत्येक आश्रम २५ वर्ष तक जीवन बिताना आवश्यक बताया गया है ।। आश्रम- व्यवस्था के अनुसार आचरण करने से जहाँ जीवन में शतायु, शक्ति बल आदि की वृद्धि होती है, वहाँ मनुष्य जीवन के अन्य अंगों का भी विकास होता है ।। अस्तु प्रत्येक आश्रम के बारे में आवश्यक जानकारी करना चाहिए ।।
   
ब्रह्मचर्याश्रम :- ब्रह्मचर्याश्रम जीवन के प्रारम्भिक वर्षों तक पालन किया जाता है ।। इन २५ वर्षों में मनुष्य के लिए ब्रह्मचर्यपूर्वक रहने का आदेश है ।। इसके साथ- साथ अपनी विभिन्न शक्तियों को विकसित करने एवं बढ़ाने का भी अवसर यही है । ब्रह्मचर्याश्रम मानव- जीवन की नींव है ।। जिसमें शक्ति संयम योग्यताओं का बढ़ाना, ज्ञान विज्ञान की सतत साधना तपश्चर्या मय जीवन बिताना, सेवा आदि से मनुष्य जीवन क सर्वांगीण विकास होता है ।। पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन शतायु होने के लिए अत्यावश्यक बताया गया है ।। ब्रह्मचर्यं ही मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है ।। कहा भी गया है ।। ''ब्रह्मचर्यतपसां देवा मृत्यु मुपाघ्नतः ।'' ब्रह्मचर्य तप से देवताओं ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की ।। अतः ऋषियों ने मनुष्य को शतायु होने के लिए सर्वप्रथम २५ साल तक ब्रह्मचर्याश्रम में रहने की आज्ञा दी, जिससे शक्ति संचय, स्वास्थ्य, तेज, बल स्फूर्ति आदि की वृद्धि होकर सौ वर्ष तक के सुखी जीवन का निर्माण होता है ।।

गृहस्थाश्रम :- मानव जीवन की दूसरी अवस्था २५ से ५० वर्ष तक गृहस्थाश्रम में प्राप्त शिक्षा, ज्ञान, स्वास्थ्य, अनुभव आदि से अपने गृहस्थ जीवन को सफल बनाया जाता है ।। गृहस्थाश्रमी में आवश्यक नियमों का पालन कर संयमी, सदाचारी नैतिक एवं पवित्र जीवन बिताना आवश्यक है ।। गृहस्थाश्रम में आवश्यक नियमों का पालन करता हुआ मनुष्य सौ वर्ष तक जीने का अधिकारी होता है ।। गृहस्थ संचालन के लिए किये जाने वाले परिश्रम, पुरुषार्थ, व्यस्तता, परस्पर सहयोग, परम पिता परमात्मा के इस सृष्टि उद्यान में उसका युवराज बनकर आनंद भोग करना, आदि मनुष्य जीवन में सरसता आदि को बनाये रखते हैं जिससे मनुष्य शतायु को प्राप्त होता है ।।

वानप्रस्थाश्रम :- मानव जीवन की तीसरी अवस्था ५० से ७५ वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम में बिताने की आज्ञा है, जिसमें वह लोक कल्याण जनहित परोपकार आदि में जीवन बिताये ।। इस आश्रम में मनुष्य को ब्रह्यचर्यपूर्वक रहने का भी आदेश है ।। इस प्रकार परमार्थ साधना में रत, देश और समाज के कल्याण के लिए अथक परिश्रम, आदि मनुष्य जीवन में नवीन उत्साह, स्वास्थ्य, उच्च भावनायें, शक्ति आदि को बनाये रखते हैं ।। साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन भी जीवन- शक्ति को नष्ट होने से बचाकर बढ़ाने में सहायक होता है ।। वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य का आत्म- संबंध विस्तृत होकर अखण्ड देश- प्रेम, समाज- सेवा, राष्ट्र- भक्ति आदि से मनुष्य में आत्मबल, साहस, सहनशीलता, समानता, उदारता, शक्ति पुरुषार्थ की निर्झरिणी बहती रहती है जो उसकी उम्र को बढ़ती है ।। यही कारण था कि महात्मा गाँधी कहते थे ''मैं १२५ वर्ष तक जिन्दा रहूँगा ।''

सन्यास आश्रम :- मनुष्य जीवन में अन्तिम आयु ७५ से १०० तक संन्यास आश्रम में बिताना चाहिए ।। इस अवस्था में मनुष्य का आत्म- विस्तार समस्त विश्व ही नहीं चराचर मात्र के लिए हो जाता है ।। उसका जीवन सेवा, परमार्थ एवं कल्याण का प्रत्यक्ष स्वरूप बन जाता है ।। संन्यासी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं, सुख- दुःखों की परवाह न करते हुए निरन्तर जनहित, जनसेवा में प्रवृत्त हो जाता है ।। उसके अन्तःकरण में प्राणिमात्र की सेवा के लिए प्रबल भावनाएँ जाग उठती हैं जिनके संयोग से उसकी शान्ति, सामर्थ्य, स्वास्थ्य, प्रतिभा अनेकों गुना बढ़ जाती हैं ।। प्रकृति भी अपनी मर्यादाओं को व्यतिरेक कर उस सर्वजनहिताय, परमार्थगामी, विश्वबन्धु संन्यासी को अनुकूल परिणाम प्रदान करती है ।। फलतः उसकी आयु क्षीण नहीं होती और पूर्ण आयु प्राप्त होता है ।।

(भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व पृ.सं.४.३४- ३५)



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