अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान -1

सारे नियंत्रणों पर नियंत्रण है—निर्बीज समाधि

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        नित नये अनुभव कराती अन्तर्यात्रा के विज्ञान के प्रयोग चेतना के रहस्यमय शिखरों की झलक दिखाते हैं। इन चेतना शिखरों में हर एक शिखर सम्मोहक है। प्रत्येक का सौन्दर्य अद्वितीय है। चेतना के हर शिखर पर बोध की नयी अनुभूति है, योग की नयी शक्ति की प्राप्ति है। अन्तर्यात्रा विज्ञान के इन प्रयोगों में प्रत्येक स्तर पर सर्वथा नयापन है। यह नयापन प्रयोग की प्रक्रिया में भी है और परिणाम की प्राप्ति में भी। जो पहले किया जा चुका है, अगली बार उससे कुछ अलग हटकर करना पड़ता है और इसकी परिणति भी कुछ अलग ही होती है। ज्यों- ज्यों यह सिलसिला चलता है, चित्त के विकार मिटते हैं। प्रत्येक विकार के मिटते ही एक नयी अनुभूति की किरण फूटती है। इन विकारों के मिटने के बाद विचारों के मिटने का क्रम आता है। साथ ही साधक की योग अनुभूति सघन होती है और सबसे अंत में मिटते हैं- संस्कार। सभी तरह के संस्कारों के मिटने के साथ ही योग साधक निर्विचार से निर्बीज की ओर छलांग लगाता है।

        अनासक्ति स्वाभाविक होती है। अंतस् में न तो विकारों की कीचड़ जमती है और न विचारों का शोर होता है। ऐसे में संस्कारों की छाया और छाप भी स्वभावतः ही हटती- मिटती है। अंतश्चेतना निर्बीज में छलांग लगाने के लिए तैयार होती है।

इस तथ्य का खुलासा करते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं-
        तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥ १/५१॥

शब्दार्थ-

        तस्य = उसका; अपि = भी; निरोधे = निरोध हो जाने पर; सर्वनिरोधात् = सबका निरोध हो जाने के कारण निर्बीजः = निर्बीज; समाधिः = समाधि (हो जाती है)।

भावार्थ-

        जब सारे नियंत्रणों पर का नियंत्रण पार कर लिया जाता है, तो निर्बीज समाधि फलित होती है और उसके साथ ही उपलब्धि होती है- जीवन से मुक्ति।

        योगर्षि पतंजलि ने इस सूत्र में जिस अनुभूति का संकेत किया है, वह व्यक्तित्व की अद्भुत घटना है। यह है- सृष्टि और जीवन में होने वाले सभी चमत्कारों का सार। यह चेतना का अंतिम शिखर है, जहाँ कोई नियंत्रण और संयम न होने के बावजूद प्रकाश और ज्ञान अपनी सम्पूर्णता में फलित होते हैं। यह वही आलोक लोक है- जिसकी चर्चा करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता (१५.६) में कहा है-
        ‘न तद्भासयते सूर्यो शशांको न पावकः।
        यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥’

        जहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि का प्रकाश होने के बावजूद प्रकाश है। जहाँ पहुँचकर फिर से वापस नहीं आना पड़ता है, वही मेरा परम धाम है। यही शिव भक्तों का महाकैलाश है और विष्णु भक्तों का वैकुण्ठ। निर्गुण उपासकों को यही ब्रह्म सायुज्य मिलता है। परम योगियों का सत्यलोक यही है।
जीवन में भली-बुरी परिस्थितियाँ हमारे अपने ही किन्हीं भले-बुरे संस्कारों का परिणाम है। इन परिस्थितियों के प्रति हमारे मन में उठने वाले भली-बुरी भाव विचार की प्रतिक्रियाएँ अपनी प्रगाढ़ता में नये संस्कारों को जन्म देती है। इस तरह संस्कारों से परिस्थितियाँ और परिस्थितियों से संस्कार यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। आचार्य शंकर की भाषा में ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्’ यानि कि फिर से जन्म और फिर मरण और फिर दुबारा माँ की कोख में आगमन-शयन। इसका कोई अंत-विराम नहीं। जन्म-मरण का यह सिलसिला अनवरत-अविराम चलता रहता है। यदि इसे कहीं विराम देना है, तो स्वयं ही चेतना पड़ता है और योग साधक को अनासक्ति, सहनशीलता और ध्यान की त्रिवेणी में गोते लगाने पड़ते हैं। इस त्रिवेणी में स्नान करने वाला चित्त ही जन्म-मरण के कालव्यूह से बाहर आ पाता है।
    इस सम्बन्ध में युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव एक गुरुभक्त के जीवन की सच्ची घटना सुनाते थे। इन महाभाग का नाम ‘रामलगन’ था। मध्य प्रदेश के छोटे से गाँव में छोटी सी दूकान और जमीन के छोटे से टुकड़े पर गुजर-बसर करने वाला यह रामलगन साधारण सा गरीब गृहस्थ था। किन्हीं शुभ संस्कारों के उदय होने से उसे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मिली और वह परम पूज्य गुरुदेव के सम्पर्क में आ गया। रामलगन की पढ़ाई-लिखाई बस साधारण अक्षर ज्ञान तक सीमित थी। हाँ, उसमें इतनी योग्यता जरूर थी कि वह अखण्ड ज्योति पढ़ सकता था और अपने गुरुदेव को चिट्ठी लिख सकता था। गुरुदेव बताते थे कि अखण्ड ज्योति संस्थान के दिनों में रामलगन का पत्र रोज आता था। वह रोज रात सोने के पहले गुरुदेव को पत्र लिखता और सुबह जागने पर उसे पास के लेटर बॉक्स में डाल देता। यही उसकी आत्म-बोध और तत्त्वबोध की साधना थी।
    जैसा नाम-वैसा गुण। रामलगन की लगन तो केवल अपने श्रीराम में थी। गुरुदेव बताते थे कि उसने अपने पत्रों में कभी भी अपने और अपने परिवार या किसी भी सगे-सम्बन्धी के किसी कष्ट-कठिनाई की चर्चा नहीं की। मथुरा आने पर भी उसने कभी कोई परेशानी नहीं बतायी। बहुत पूछने पर केवल इतना कह देता कि गुरुदेव मैं तो केवल माताजी के हाथ का बना प्रसाद पाने और आपका चरण स्पर्श करने आता हूँ। जैसी उसकी अपूर्व भक्ति थी-वैसी ही उसकी कर्मनिष्ठा थी। छोटी सी सामर्थ्य के बावजूद गुरुकृपा के बलबूते बड़े आयोजन करा लेता था। अंशदान-समयदान उसके जीवन में नियमित अंग थे।
    एक दिन गुरुदेव अपने इस अद्भुत भक्त पर प्रसन्न होते हुए बोले-तुम क्या चाहते हो रामलगन? तुम जो भी चाहोगे, मैं वह सब दूँगा-बोलो! रामलगन अपने परम समर्थ गुरु की कृपा पर थोड़ी देर तक मौन रहा। फिर बोला-गुरुदेव! मेरी वैसी कोई सांसारिक चाहत तो नहीं है, बस एक जिज्ञासा है, निर्बीज समाधि को जानने की जिज्ञासा। जैसे समर्थ गुरु वैसा ही दृढ़निष्ठ जिज्ञासु शिष्य। गुरुदेव ने उत्तर में कहा-रामलगन क्या तुम अपने जीवन में भयानक कष्ट सहने के लिए तैयार हो? इस सवाल पर गहराई से सोच लो। यदि तुम्हारा जवाब हाँ में होगा, तो तुम्हारी जिज्ञासा पूरी हो जायेगी।
    अपनी बात पूरी करते हुए गुरुदेव ने उसे बताया-निर्बीज समाधि के लिए चित्त के सभी संस्कारों का दहन-शोधन जरूरी है और यह प्रक्रिया कठिन एवं दीर्घ है। काम कई जन्मों का है। यदि इसे एक जन्म में पूरा करें, तो कठिन स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। चित्त से संस्कार तीव्रतापूर्वक निकालने पर जीवन में बड़ी तीव्रता से परिवर्तन आते हैं। शरीर भी इसे तभी सहन कर पाता है, जबकि निरन्तर तपरत रहे। अन्यथा बीच में इसके छूट जाने की स्थिति बन जाती है। गुरुभक्त रामलगन को बात समझ में आयी। उसके हाँ कहते ही गुरुदेव के संकल्प के प्रभाव से उसके जीवन की परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन आने लगे। गायत्री साधना, चन्द्रायण व्रत, अलोना भोजन, गुरुदेव का ध्यान और नियमित काम-काज उसका जीवन बन गया।  धैर्य और मौन ही उसके साथी थे। गुरुभक्ति ही उसका सम्बल थी। इस प्रक्रिया में उसे कई दशक गुजरे और अंत में उसे गुरु भक्ति का प्रसाद निर्बीज समाधि के रूप में मिला। उसके जीवन की अंतिम मुस्कान में चेतना के सर्वोच्च शिखर का परम सौन्दर्य झलक रहा था।


॥ ॐ तत्सत् इति प्रथमः समाधिपादः समाप्तः॥
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