अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य -2

लेडी डॉक्टर को मिला दिशा निर्देश

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        घटना सन् 2000 ई. की है। होली के दो दिन बाद ही मेरी बड़ी बेटी गायत्री का आकस्मिक रूप से निधन हो गया। बेटी का दाह संस्कार सम्पन्न होने के तीसरे या चौथे दिन पत्नी के साथ तुलसीपुर लौट आया। शादीशुदा जवान बेटी की मौत के सदमे से मेरी पत्नी माया बुत में बदल चुकी थी। खाना- पीना छोड़कर घर के किसी कोने में पड़ी रहती थी। दो- तीन दिन बाद पत्नी के पेट में भीषण दर्द शुरू हुआ। मैं उन्हें तुरन्त जिला चिकित्सालय ले गया। वहाँ डॉ. आर.पी. वर्मा ने महिला परीक्षण में असमर्थता व्यक्त करते हुए यह केस जिला चिकित्सालय, बलरामपुर को रेफर कर दिया।

        बलरामपुर अस्पताल में सर्जरी विभाग की डॉ. अर्चना गुप्ता ने जाँच शुरू की। प्रारम्भिक जाँच से वे किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकीं। इसलिए कई विशेष प्रकार की जाँच की प्रक्रिया शुरू की गई। उसी दिन मुझे मिशन के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में जाना था। जाँच की इस लम्बी प्रक्रिया में जब देर होने लगी, तो अन्ततः मैं माया को छोटे भाई की पत्नी प्रेमू के साथ लेडी डॉक्टर के भरोसे छोड़कर चला आया। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब मैं आवास पर पहुँचा, तो पता चला कि वे अभी तक अस्पताल से नहीं लौटी हैं। चिन्तातुर होकर हम दोनों भाई मोटर साइकिल से अस्पताल पहुँचे। माया थकी- हारी सी वहीं बैठी थी। उसने मुझे देखते ही उतावलेपन से कहा- डॉ. अर्चना से मिलिए। वे आपके बारे में कई बार पूछ चुकी हैं।

        मैं घबराया हुआ डॉक्टर के पास गया। उन्होंने मुझे बताया कि मरीज के पेट में बहुत बड़ा ट्यूमर है। कॉम्प्लिकेशन्स बहुत बढ़ गए हैं। तुरन्त ऑपरेशन करना जरूरी है। अस्पताल तो सरकारी था, पर बड़े ऑपरेशन के लिए बहुत सारी दवाइयाँ बाहर से खरीदकर लानी पड़ती थीं। सो मैंने सकुचाते हुए पूछा- पैसे कितने खर्च होंगे? आठ हजार रुपये- लेडी डॉक्टर ने यह कहते हुए दवाओं की लिस्ट मेरी तरफ बढ़ा दी।

        मेरे पास उस समय मात्र ३,००० रुपये थे। बाकी के पाँच हजार अभी कहाँ से पूरे होंगे, यह समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन चिन्ता का कोई भाव मैंने अपने चेहरे पर नहीं आने दिया और कहा- आप ऑपरेशन की तैयारी करें। मैं ये दवाएँ लेकर अभी आता हूँ।

        बाकी के पैसे का इन्तजाम छोटे भाई सत्यप्रकाश ने किया। सारी दवाएँ आ गईं। ऑपरेशन की तैयारी पूरी हो चुकी थी। रात के आठ बजे पत्नी को ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया। लेप्रोस्कोपिक के जरिये ऑपरेशन किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। उसी क्षण दूसरे ऑपरेशन का निर्णय लिया गया। पेट की दोनों ओर पसली के नीचे से बहुत बड़ा चीरा लगाकर ट्यूमर निकालने की कोशिश की गई, लेकिन इसमें भी सफलता नहीं मिली। डॉ. अर्चना बदहवासी की हालत में ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकलीं।

        सत्यप्रकाश की पत्नी दरवाजे पर ही बैठी थी। हड़बड़ाए हुए स्वर में डॉ. ने उनसे कहा- मेरे अब तक के जीवन में कभी ऐसा नहीं हुआ। मैंने दो ऑपरेशन किए, लेकिन दोनों फेल हो गए। तब तक लपकते हुए मैं भी उनके पास आ चुका था। मुझे देखते ही उन्होंने कहा- कुछ बड़े डॉक्टरों को बुलाकर तीसरा ऑपरेशन करना पड़ेगा। नतीजा कुछ भी हो सकता है। आप जल्दी फैसला कीजिए।

        डॉ. अर्चना की बातें सुनकर मैं अन्दर तक काँप उठा। हॉस्पीटल में ऑक्सीजन तक की भी व्यवस्था नहीं है, मोमबत्ती और दो सेल के एक टार्च की रोशनी में दोनों ऑपरेशन हुए हैं। ऐसे में तीसरा ऑपरेशन! यह सब सोचकर मेरी आँखें बन्द हो गईं। धड़कन लगभग रुक सी गई थी। सिर से पैर तक चिन्ता के सागर में डूबा हुआ परम पूज्य गुरुदेव और वंदनीया माता जी का ध्यान करने लगा।

        कुछ ही पलों के बाद मैं आत्मविश्वास से भरा हुआ था। मैंने डॉक्टर से सहज स्वर में कहा- परिणाम ईश्वर पर छोड़िये, मैं तीसरे ऑपरेशन के लिए तैयार हूँ। थोड़ी ही देर में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम पहुँच गई। तीसरा ऑपरेशन शुरू हुआ। पेट में ६- ७ इंच का लम्बा चीरा लगाकर दो से ढाई किलो का ट्यूमर बाहर निकाल लिया गया। तीसरा ऑपरेशन पूरा होने में सुबह के तीन बज गए थे। पत्नी को ऑपरेशन थियेटर से बेहोशी की हालत में बाहर लाकर वार्ड के बेड पर लिटा दिया गया। मैं बेड़ के पास ही रखे हुए स्टूल पर बैठ गया।

        ब्रह्ममुहूर्त की उपासना का समय हो चुका था। मेरे पास पूज्य गुरुदेव तथा वन्दनीया माता जी का फाइबर का बना एक पुराना चित्र था। उस चित्र को सामने के टूल बाक्स पर सजाकर जप करने लगा। अभी जप की पहली माला भी पूरी नहीं हुई थी कि किसी ने मेरे दोनों कं धों को जोर से झकझोरा।

        मैंने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं। देखा- सामने हकबकाई सी डॉ. अर्चना खड़ी हैं। उन्होंने अपने मोती जैसे दाँतों के बीच टूथब्रश दबा रखा था। आँखें आश्चर्य से फटी हुई थीं। मैं कुछ पूछता ,इसके पहले ही उन्होंने जोर से कहा- पूजा बन्द कीजिए। मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।  मुझे लगा कि शायद मेरी पत्नी दम तोड़ चुकी है। मेरी हालत से बेखबर डॉक्टर ने उँगली से इशारा करते हुए पूछा- यह चित्र किसका है? मैं तो, जैसे, कुछ सुन ही नहीं सका। चुपचाप डॉ. अर्चना को देखे जा रहा था- एकटक।
        मेरी चुप्पी ने उनका उतावलापन बढ़ा दिया। वे पहले से भी ऊँची आवाज में बोलीं- मैं पूछती हूँ, यह चित्र किसका है? अब मेरा ध्यान टूटा। मेरी समझ में आ गया कि मामला कुछ और है। चित्र को लेकर उनकी जिज्ञासा को देखते हुए मैं अनायास बोल पड़ा- क्यों, क्या बात है? डॉक्टर ने उत्तर पाने के उतावलेपन में अपना सवाल फिर से दुहराया। मेरी नजर चित्र पर गई। चित्र में वन्दनीया माता जी के साथ गोल गले का खादी का कुर्त्ता पहने परम पूज्य गुरुदेव मुस्कुरा रहे थे।

        मैंने डॉक्टर से कहा- ये मेरे गुरुदेव हैं। डॉ. अर्चना फटी- फटी आँखों से चित्र को देखे जा रही थीं। कई पल बीत गए। फिर घोर आश्चर्य के स्वर में उन्होंने कहा- यही है...यही वह व्यक्ति है, जो पूरे ऑपरेशन के दौरान मेरी हिम्मत बँधाकर कदम- कदम पर मुझे निर्देश देता रहा। इतना मेजर ऑपरेशन करना मेरे वश की बात नहीं थी। ऐसा ही खादी का कुर्त्ता पहने हुए यह आदमी ऑपरेशन थियेटर में बिल्कुल मेरे साथ खड़ा था। मैंने अपने दिमाग से कुछ भी नहीं किया। जो- जो इसने कहा, मैं करती चली गई। जरा भी घबराहट होती थी, तो यह मेरा हौसला बढ़ाने लग जाता था। एक तरह से इसने मेरा हाथ पकड़कर ऑपरेशन पूरा कराया। इतनी बड़ी सफलता का सारा श्रेय इसी आदमी को जाता है।

        लगातार बोलते- बोलते वह हाँफने लग गई थीं। थोड़ी देर तक जोर- जोर से साँसें लेती रहीं, फिर कहना शुरू किया- ऑपरेशन की आपाधापी में मैंने यही सोचा था कि ये बाहर से बुलायी गयी डॉक्टरों की टीम के बड़े डॉक्टर होंगे। ऑपरेशन पूरा करने के बाद जब हम बाहर निकले, तो मैंने इनसे बात करनी चाही। लेकिन यह मुझे कहीं नजर नहीं आए। मैंने सोचा, बड़े डॉक्टर हैं, बाहर निकलते ही गाड़ी में बैठकर घर चले गए होंगे। अब सामने की यह तस्वीर देखकर और आपके बताने पर भी मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि ये आपके गुरुदेव ही हैं।

        डॉ. अर्चना की बातें सुन- सुनकर मेरी आँखों से आँसुओं की अविरल धार बहती जा रही थी। गुरुसत्ता की इस असीम अनुकम्पा से मैं अभिभूत हो गया था। डॉक्टर के अन्तिम शब्दों को सुनकर मैं सुबक- सुबक कर रोने लगा। डॉक्टर ने मेरे कन्धे पर हाथ रखकर मुझे शान्त करते हुए अनुनय के स्वर में कहा- भगवान सरीखे अपने गुरुदेव के बारे में विस्तार से बताइए। ये कौन हैं, कैसे हैं, इनका नाम क्या है?

        आँसू पोछते हुए मैंने गद्गद् स्वर में कहा- मेरे गुरुदेव का नाम पं. श्रीराम शर्मा ‘आचार्य’ है। ये कोई साधारण मानव नहीं हैं। ये तो महाकाल के अवतार हैं। डॉ. अर्चना ने सहमति के भाव में सिर हिलाते हुए पूछा- ये रहते कहाँ हैं, क्या आप मुझे इनसे मिलवा सकते हैं?

        डॉक्टर के इस प्रश्न पर मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा- वे तो इस संसार के कण- कण में व्याप्त हैं। मेरी भाव विमुग्धता देखकर डॉक्टर के होठों पर भी हँसी आ गई। उन्होंने कहा- आपके गुरुदेव की सर्वव्यापकता तो मैं अपनी आँखों से देख ही चुकी हूँ। आप कृपा करके मुझे इतना भर बता दें कि वे इन दिनों मुझे कहाँ मिलेंगे।

        उनका आशय समझ कर मैंने कहा- पू. गुरुदेव सन् १९९० में ही शरीर के बन्धन से मुक्त हो चुके हैं। अपने इस जीवन काल में उन्होंने युग परिवर्तन की जो ज्योति जलाई, उसे सम्पूर्ण विश्व में फैलाने के लिए वे विभिन्न प्रकार की योजनाओं का संचालन सूक्ष्म जगत से करते रहते हैं।

        यह सुनकर डॉ. अर्चना के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। बड़ी कठिनाई से अपने- आप को सहज करते हुए उन्होंने कहा- धन्य हैं आपके गुरुदेव! मेरा दुर्भाग्य है कि मैं उनसे मिल नहीं सकूँगी। पीड़ा से भरे हुए उनके ये शब्द सुनकर मैंने उन्हें सान्त्वना देते हुए गायत्री तीर्थ, शान्तिकुञ्ज के बारे में विस्तार से बताया और विगत छह दशकों से चलायी जा रही युग निर्माण योजना की जानकारी दी।

        डॉ. अर्चना ध्यान मग्न होकर मेरी बातें सुन रही थीं। उनकी आँखों में मेरे प्रति गहरी श्रद्धा का भाव था- शायद यह सोचकर कि मुझे ऐसे सर्व समर्थ गुरु की शरण में रहने का सौभाग्य मिला है।  उन्होंने अपनत्व दिखाते हुए अधिकारपूर्वक कहा- ऑपरेशन का सारा खर्च मैं उठाऊँगी। अब तक जितने की दवाएँ आई हैं, उसका हिसाब मुझे बता दीजिए। भुगतान मैं करूँगी। आगे से आपको कुछ भी लाने, करने की कोई जरूरत नहीं है। अब आप दोनों यहाँ मेरे अतिथि हैं।

        इस प्रकार डॉ. अर्चना को सहयोग करने की प्रेरणा देकर पूज्य गुरुदेव ने मेरा आर्थिक संकट भी दूर कर दिया। बेहोशी की हालत में २४ घंटे डिप चलती रहती थी, खून की बोतलें और ढेर सारी महँगी दवाएँ भी बाहर से ही मँगवानी पड़ती थीं। वायदे के मुताबिक़ सारा व्यय भार डॉ. अर्चना ने ही उठाया।       

        पाँच दिनों के बाद पत्नी को होश आया। होश आने पर रिकवरी तेजी से शुरू हुई। इतने बड़े आपरेशन के बाद भी २०वें दिन ही अस्पताल से छुट्टी मिल गई। पत्नी को भाई के घर छोड़कर मैं अगले ही दिन शान्तिकुंज के लिए चल पड़ा। शान्तिकुञ्ज पहुँचकर मैं श्रद्धेया शैल जीजी से मिलने गया। मेरे साथ तुलसीपुर के पाँच- सात परिजन भी थे।
        मैं जैसे ही जीजी को प्रणाम करने झुका, वह तुरंत पूछ बैठीं- भैया। कहिए, वे ठीक हैं न? मैंने कहा- कौन? वे बोलीं- क्यों, पत्नी का ऑपरेशन हुआ है न? मैं चकित होकर बोल पड़ा- आपसे किसने कहा? किंचित विस्मय से भरी जीजी ने उत्तर दिया- चार दिन पहले ही तो आप स्वयं आकर पत्नी की प्राण रक्षा के लिए सामूहिक यज्ञोपासना का अनुरोध करके गए थे।

        मैं कुछ बोल नहीं सका। मुझे आश्चर्य में डूबा देखकर श्रद्धेया जीजी ने आँखें बन्द कर लीं। कुछ ही पलों बाद आँखें खोलकर मुस्कुराते हुए कहा- पूज्य गुरुदेव ने उन्हें नया जन्म दिया है। गुरुदेव की कृपा दृष्टि आप पर बनी हुई है। निश्चिन्त होकर जाइए। आगे भी सब ठीक रहेगा।

        वापसी में सीढ़ियों से उतरते हुए यही सोचता जा रहा था कि जब मैं आज से ५ दिन पहले बलरामपुर के जिला अस्पताल में था, तो मेरे रूप में जीजी के पास कौन आ सकता है। तभी कुछ ऐसी अन्तश्चेतना जागी कि इस पहेली का हल मुझे मिलता चला गया। जीवन में कर्म के महत्त्व को प्रतिपल आचरण से प्रतिपादित करने वाले योगीराज पहले ऑपरेशन थियेटर में डॉ. अर्चना को राह दिखाते रहे और बाद में मेरा ही रूप धरकर मेरी पत्नी की प्राण रक्षा के लिए युगतीर्थ शांतिकुंज में सामूहिक साधना की व्यवस्था बनाने चले आए।
                   
प्रस्तुतिः चन्द्रमणि शुक्ल
देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार(उत्तराखण्ड)  

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