युगगीता (भाग-४)

भविष्य में हमारी क्या गति होगी, हम स्वयं निर्धारित करते हैं

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योगभ्रष्ट की गति

भगवान आगे कहते हैं-
प्राप्त पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥ ६/४१॥

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥ ६/४२॥


पहले शब्दार्थ देखते हैं—

योग से भ्रष्ट व्यक्ति (योगभ्रष्टः) पुण्यवानों के (पुण्यकृतां) लोकों को (लोकान्) पाकर (प्राप्य) अनेक (शाश्वतीः) वर्ष (समाः) वहाँ निवासकर (उषित्वा) पवित्र पुण्यात्मा (शुचीनां) सम्पन्न व्यक्तियों के (श्रीमतां) घर में (गेहे) जन्म ग्रहण करते हैं (अभिजायते)६/४१

अथवा (अथवा) ज्ञानी (धीमतां) एवं योगियों के ही (योगिनां एव) वंश में (कुले) जन्म ग्रहण करते हैं (भवति) इस प्रकार का (ईदृशम्) जो (यत्) यह जन्म है (एतत् जन्म)- [वह] इस संसार में (लोके) निस्सन्देह (हि) बहुत ही दुर्लभ है (दुर्लभतरं)६/४२

भावार्थ इस प्रकार हुआ—

‘‘योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यकर्मियों के लोकों को प्राप्त होकर और वहाँ शाश्वत समय तक निवास करके फिर पवित्र शुद्ध आचरण वाले सम्पन्न व्यक्तियों के घरों में जन्म लेता है। अथवा बुद्धिमान योगियों के कुल में वह जन्म लेता है। (चूँकि वैराग्य की ओर उसका रुझान होता है) परंतु इस प्रकार का जो जन्म है, वह संसार में निस्सन्देह अत्यन्त दुर्लभ होता है। ६/४१- ४२’’

एक श्रेष्ठ मार्ग पर चले महापुरुष की योगभ्रष्ट होने पर भविष्य में क्या गति होती है, इस संबंध में ही स्पष्ट चिन्तन योगेश्वर श्रीकृष्ण ने प्रस्तुत किया है जो भी किसी साधक ने कल्याणकारी कार्य आरंभ किया था, वह निरर्थक नहीं जाता, उसके सत्परिणाम उसे मिलते अवश्य हैं एवं वे भविष्य के उसके जन्म में फलित होते हैं।

पूर्व के संस्कार फलित होते हैं

एक आशा की किरण अभी भी विद्यमान है। यदि कोई योगपथ का पथिक परमपद न पा सका और मृत्यु को प्राप्त हो गया, तो उसने जो भी कुछ शुभ किया है, वह नितान्त निरर्थक नहीं जाता। श्रीकृष्ण कहते हैं कि चूँकि उसका मन विषयों की ओर आकर्षित था- वह मन का पूरी तरह निग्रह नहीं कर सका, अतः वह पूर्व के कुसंस्कारों के कारण शाश्वत समय पुण्यकर्मियों के लोकों में वापस कर पवित्र व संपन्न व्यक्तियों के घर में पुनः जन्म लेता है। योगभ्रष्ट योगी एक लम्बे समय तक भोग भोगने के बाद पुनः शरीर धारण करता है- वह भी ऐसे उपयुक्त वातावरण में कि योग साधना की प्रक्रिया को पुनः वहीं से आरम्भ कर सके, जहाँ उसने छोड़ा था।

पुनर्जन्म लेने वाले योगभ्रष्ट साधक के अंतःकरण में कुछ विषय वासनाएँ ऐसी होती हैं जिनका क्षय उसके द्वारा सम्पन्न व्यक्तियों के घर में (श्रीमतां गेहे) जन्म लेकर ही हो सकता है। एक और विकल्प योगेश्वर देते हैं कि ‘‘अथवा वह बुद्धिमान योगियों के कुल में जन्म लेता है। (चूँकि वैराग्य का प्रतिशत उसके चिन्तन में ज्यादा होता है), किंतु ऐसा जन्म अत्यन्त दुर्लभ होता है। सूक्ष्मशरीर स्वर्गलोक जाकर लौट आता है और अपने लिए अनुकूल वातावरण ढूँढ़ता है। निरन्तर ध्यान साधना में लीन होता हुआ वह एक विद्वान पिता के महान पुत्र के नाते अपनी बाल्यावस्था से ही साधना प्रारंभ कर अल्पकाल में ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है। किंतु श्रीकृष्ण का बड़ा गंभीरता पूर्वक दिया गया मत है कि ऐसा जन्म संसार में अत्यन्त दुर्लभ है (एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्)। ऐसे जन्मजात व्यक्ति बुद्ध, यीशु, शंकराचार्य, शुकदेव की तरह विरले ही होते हैं।’’ निष्कर्ष यही निकलता है कि आध्यात्मिक साधना के निमित्त किया गया पुरुषार्थ कभी निरर्थक नहीं जाता। नियमितता, निरन्तरता यदि ध्यान की बनी रहे, तो भले ही कुछ चमत्कार तुरंत न दिखाई दें- भीतर क्रांति अवश्य होगी। सूक्ष्म स्तर पर उसका फल निश्चित ही दिखाई देगा। किसी की प्रगति जल्दी होती है इसी जन्म में होती है एवं मुक्ति मिल जाती है तथा किसी को देरी से मिलती है। परन्तु अर्जुन के पूछे गए प्रश्र की तरह किसी का भी छिन्न- भिन्न बादलों की भाँति नाश नहीं होता। अर्जुन के सन्देह का यथोचित समाधान श्रीकृष्ण ने दिया है; ताकि वह या उसके जैसा कोई साधक कभी साधना क्षेत्र में विघ्र आने पर निराश न हो।

मृत्युः एक सृजन पर्व

भारतीय संस्कृति में जीवन- मरण सहज स्वाभाविक प्रक्रियाएँ हैं। मृत्यु को एक त्यौहार माना गया है और यही कहा गया है कि एक अध्याय समाप्त होकर दूसरा आरंभ हो गया। परलोक सुधारने की बात भी स्थान स्थान पर कही गयी है। बालक- युवा होता है- प्रौढ़ होता है- मृत्यु को प्राप्त होता है, उसी तरह मृत्यु के बाद भी जीवन बना रहता है- आत्मा की यात्रा निरन्तर जारी रहती है- पूर्व के संस्कारों को लेकर वह निर्बाध गति से चलती रहती है। भूत से वर्तमान एवं यही प्रवाह भविष्य के निकास के रूप में- जीवन के आयाम हैं। मृत्यु तो एक घटना भर है, जिसने उस जीवन की लीला का पटाक्षेप कर दिया। सूक्ष्म शरीर अपनी संस्कार युक्त अनुभवों से भरी ज्ञान की निधि को लेकर चल रही यात्रा पर अनवरत चलता रहता है। उसका यह निरन्तरता का नियम कभी टूटता नहीं। इसलिए किसी भी साधक या योगी या शुभ कल्याणकारी कार्य करने वाले को अपने शुभ कर्मों के फल के प्रति शंकालु नहीं होना चाहिए। वे इस शरीर के नष्ट होने से नष्ट नहीं हो जाते। वे सतत यात्रा करते रहते हैं एवं भविष्य की गति का निर्धारण होने के साथ फलित होते हैं।

कई बार योगभ्रष्ट शब्द जो श्लोक ४१ में आया है, गलत समझ लिया जाता है। इससे अर्थ यह नहीं लिया जाना चाहिए कि वह व्यक्ति योग से च्युत हो गया अब कभी उठ नहीं पाएगा। या योग में भ्रष्ट आचरण उसके द्वारा हो गया ।। इसका अर्थ जो यहाँ है, वह यह कि वह साधक योग सिद्धि की पराकाष्ठा तक नहीं पहुँच सका। बीच में मन विचलित हो गया। थोड़ा बहुत शुभ कर्म तो उससे अवश्य हुआ। निर्वाण या मुक्ति से पूर्व प्रत्येक योग साधक अपने- अपने भले कर्मों के फलानुसार उच्च लोकों को प्राप्त होते हैं और पुण्य क्षय होते ही फिर मुक्ति लाभ हेतु अनुकूल घरों में जन्म लेते हैं। पुनः साधना करते हैं और ईश्वर की कृपा से निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त होते हैं। पुण्यवान के पुण्य कर्मों का एक छोटा सा हिस्सा भी व्यर्थ नहीं जाता। सभी कर्मों का फल उसे मिलता है।

गायत्री परिजनों के दायित्व

कभी कभी हम सभी जो गायत्री परिवार में परम पूज्य गुरुदेव का कार्य कर रहे हैं- विद्या विस्तार के पुण्य प्रयोजन में लगे हैं अथवा विचार क्रांति के लक्ष्य की पूर्ति हेतु विभिन्न रचनात्मक कार्यों में स्वयं को नियोजित करते हैं, सोचने लगते हैं कि हमसे तो पूर्ण नियमादि का पालन कर संयमादि अनुशासनों को निभाकर कड़ी साधना हो नहीं पायी। हमें क्या फल मिलेगा? क्या हम भी कभी मुक्ति पा पाएंगे। कभी एकान्त साधना, विशिष्ट तप, क्रिया तो हम कभी कर नहीं पाए- हम तो झोला पुस्तकालय लेकर लोगों तक गुरुसत्ता के विचार पहुँचाते रहे- नियमित रूप से मात्र तीन या पाँच माला गायत्री की करते रहे, वह भी कभी मन लगता रहा, कभी नहीं लगा। हमें क्या फल मिलेगा। योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुँह से जो एक शाश्वत वचन निकला है, उसी को हम पूज्यवर का आश्वासन भी मान सकते हैं। परम पूज्य गुरुदेव का कार्य युग निर्माण का महती कार्य है- एक अवतारी चेतन सत्ता द्वारा किया जा रहा कार्य। इसके लिए किया गया छोटा- सा पुरुषार्थ भी हमें पुण्यकर्मों के संचय की ओर ले जाता है। जितना हम करते जाते हैं, उतना ही अच्छे कर्मों का कोष एकत्र होता चला जाता है। इस जन्म में तो नहीं अगले जन्म में निश्चित ही उस पुण्य सम्पदा के सहारे हम भवबंधनों से मुक्त हो जायेंगे।

यह आश्वासन हमें सुनिश्चित मानना चाहिए। हमें यह याद रखना है कि हम किस स्तर की सत्ता से जुड़े हैं- वही जो समय- समय पर ‘‘संभवामि युगे युगे’’ का अपना आश्वासन पूरा करने आती रही हैं। ऐसे में हमें कार्य करने का अवसर मिला, यही सौभाग्य अपना मानकर सतत उसी में लगे रहने का प्रयास करना चाहिए। अपने कार्य व समर्पण में और तीव्रता लाना चाहिए; ताकि हम उनके लक्ष्य की पूर्त्ति के साथ अपना परलोक सुधारने- पापकर्मों का क्षय करने की प्रक्रिया भी पूरी कर सकें। हमारा एक भी कल्याणकारी कार्य- एक व्यक्ति को युग निर्माण- प्रक्रिया से, गायत्री व यज्ञ अभियान से जोड़ना भी निरर्थक नहीं जाएगा। वह निश्चित ही फलित होगा, यह एक विश्वास सतत मन में रखे रहना चाहिए। भले ही हम उच्च स्तरीय ध्यान योग न कर पाये हों।

दुर्लभतर
जन्म


एक बात और कही गयी है वासुदेव द्वारा। ऐसा जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। (एतत हि दुर्लभतरं लोके जन्म यत् ईदृशं) अर्थात् प्रत्येक जीवात्मा को प्रारब्ध कर्म के फल भोग के अनुकूल ही जन्म ग्रहण करना है। यह सृष्टि का एक शाश्वत नियम है। इस नियम में कभी भी कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। अपवाद रूप में भी नहीं। मोक्ष प्राप्ति का कारण होने से- पूर्व जन्मों की वैराग्य मनोभूमि एवं संचित सुसंस्कारों की निधि होने से स्तुति रूप में इसे दुर्लभतरं उपाधि दी गई है। उसके लिए उस जन्म का बड़ा उच्चस्तरीय पुरुषार्थ चाहिए। जहाँ से छूट गया था, अगले जन्म में ज्ञानी- योगी जनों के घर जन्म लेकर वह पूरा कर लिया जाता है। कभी कभी ऐसे लोग अपना कार्य समाप्त कर जल्दी देह भी छोड़ देते हैं। ऐसे व्यक्तियों की दिव्य गति मानी जानी चाहिए। उनके वियोग का मनों संताप भी मन में नहीं रखना चाहिए।

अब कुछ भ्रांतियाँ और स्पष्ट हो जानी चाहिए। योगभ्रष्ट स्वर्गादि के भोग भोगने के बाद मृत्युलोक में क्यों लौटकर आता है और क्यों वह शुद्ध श्रीमानों के घर में जन्म लेता है। यह श्रीमान लोग कौन सज्जन होते हैं? जो मनुष्य जीवन भर योग साधन- पूजापाठ कर्म करता रहा, उसका वह साधन मृत्यु के समय छूट गया। कहीं बीच में असंयम भी होता रहा। पर उन साधनों की महत्ता सुसंस्कारों की छाप के रूप में उसके अंतःकरण पर अंकित हो गई। ऐसी स्थिति में वह अन्य लोकों में उपभोग के बाद भी प्रेरित होता है- साधना पथ पर अग्रगामी बनने के लिए। पूर्व जन्म का योगाभ्यास उसे बरबस श्रीमानों के घर में खींच लेता है एवं वह भोगादि सुखों को जीवन में स्थान देते हुए भी अपनी पूर्णता की यात्रा पूरी कर ही लेता है। एक प्रकार से भगवान उसे पूर्वजन्म की साधना का पुरस्कार देते हैं एवं भोग की सूक्ष्म वासना के कारण उसका जन्म श्रीमन्तों के यहाँ होता है।

शुद्ध श्रीमान उन सज्जन पुरुषों- श्रीमन्तों को कहा जाता है, जिनका परिश्रमजन्य धन पवित्र स्रोतों से आया है। कभी किसी का हक उनने मारा नहीं है। मन- अंतःकरण से उनकी भोगों में ममता नहीं है। भोग बुद्धि के वशीभूत हो, वे किसी पर जबरन अपना अधिकार नहीं जताते। घर में जिनके सुसंस्कारों का वास होता है तथा जिसने परिवार निर्माण की साधना की होती है। जो स्वयं को धन- मकान का उपभोक्ता होने के कारण मालिक मानते हैं, वे श्रीमान नहीं कहलाते। वे तो वास्तव में धन के गुलाम होते हैं। यह परिभाषा स्पष्ट हो जाने पर धनवान, सम्पत्तिवान एवं श्रीमान- शुद्ध जीवन जीने वाले श्रीमन्तों में अंतर स्पष्ट हो जाएगा।

वैरागी योगी की गति

श्लोक क्रमांक ४२ में भगवान ने जिस साधक की चर्चा की है, वह योगभ्रष्ट अवश्य है पर उसके अंदर तीव्र वैराग्य की भावना है। वह सीधा योगियों के कुल में जन्म लेता है और भगवान की दृष्टि में यह जन्म बड़ा ही दुर्लभ है। जिस घर में जरा भी चर्चा प्रसंगवश भी सांसारिक भोगों की नहीं होती। बाल्यकाल से ही उसे साधनामय वातावरण मिलता है। उसे शिक्षा- विद्या सभी मिलते चले जाते हैं। उसकी साधना की पूर्णता उसे यहाँ शीघ्रातिशीघ्र मिलती है। उसी कारण ऐसे योगियों के कुल में जन्म लेने की प्रक्रिया को दुर्लभतर रूप में प्रतिपादित करते हैं। शास्त्रों में मनुष्य जन्म वैसे ही दुर्लभ बताया गया है। (सुरदुर्लभ मानुस तन) पर मानव जन्म लेने के बाद यदि महापुरुषों- योगियों का साहचर्य मिल जाय, तो यह और भी दुर्लभ माना गया है; क्योंकि जन्म लेने के बाद भी उन महापुरुषों को पहचानना अत्यधिक कठिन है। सत्संग यदि मिल जाय, आभास यदि हो जाय तो वह कभी निष्फल नहीं जाता, निश्चित ही पूर्णता की यात्रा सफल होकर रहती है। हम सभी बड़े सौभाग्यशाली हैं कि हमें परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा जी आचार्य एवं शक्ति स्वरूपा माताजी का सान्निध्य मिला। हम उन्हें पहचान पाये कि नहीं, यह बात अलग है। वर्षों साथ बने रहे पर यदि उन्हें एक साधारण मानव- दम्पत्ति मात्र मानते रहे, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। अभी भी हम उनका सान्निध्य उनके द्वारा बतायी योग साधना सम्पादित कर उनके स्वर में स्वर मिलाकर ध्यान कर तथा उनके द्वारा लिखी हजारों पुस्तकों का स्वाध्याय करके पा सकते हैं। यदि हम उनके अनुचर बने रहे तो योगभ्रष्ट होने पर भी मुक्ति का पथ प्रशस्त कर लेंगे।

अपना भावी जन्म सुधार लें हम

हमारे एक भूतपूर्व एवं स्वतंत्र राष्ट्र के प्रथम प्रधानमंत्री के बारे में कहा जाता है कि वे भी पूर्व जन्म में एक बड़े योगी थे- हिमालय में तपरत थे पर किन्हीं कारणोंवश भोगों में रुचि जाग उठी। ध्यान साधना अधूरी छूट गयी एवं शरीर भी छूट गया। पुनः उनने जन्म लिया एवं वह जन्म श्रीमन्तों के खानदान में हुआ, जहाँ उन्हें किसी भी प्रकार का अभाव नहीं था। भोग में रुचि की प्रबलता उन्हें उस कुल में खींच लाई। राष्ट्र के स्वातंत्र्य यज्ञ में उनने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, पर साधना के लिए मिले इस महत्त्वपूर्ण अवसर का वे कितना लाभ उठा पाए, यह प्रश्र तो काल के गर्भ से उत्तर माँगेगा। हम नहीं जानते, उनकी क्या गति हुई; पर यदि थोड़ा सा भी आध्यात्मिक साधन व्यक्ति (योगभ्रष्ट) साधले, तो वह अपना यह जन्म सुधारकर भवबंधनों से मुक्ति पा सकता है।

परम पूज्य गुरुदेव हम सभी से कहते थे कि तुम सभी पूर्व जन्म के योगी हो। तुमसे मैं स्वाध्याय इसीलिए कराता हूँ कि यही तुम्हें मुक्त करायेगा। ज्ञान ही संस्काररूप में आत्मा के साथ यात्रा करता है। संभव है इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में इस ज्ञान की थाती के बलबूते हमें जन्म- मरण के बंधनों से मुक्ति मिल जाय। भगवान न योगभ्रष्ट को छोड़ते हैं न योग साधन में लगे व्यक्ति को। कर्म विधान व योग साधना की तीव्रता के अनुरूप ही हमारा भविष्य का जन्म निर्धारित होता है।

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