युगगीता (भाग-४)

सुख या दुख में सर्वत्र समत्व के दर्शन करता है योगी

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    गीता के छठे अध्याय का तीसवाँ एवं इकतीसवाँ श्लोक विशेष मनन करने योग्य है। इन्हीं में से तीसवें की विस्तृत व्याख्या विगत अंक में प्रस्तुत की गई थी। आत्मवत् सर्वभूतेषु की पूज्यवर की विस्तृत विवेचना का वर्णन पाठकों ने उनकी ही लेखनी के माध्यम से जाना। स्वयं उनने यह जीवन जिया और वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की मान्यता को अपने जीवन में विकसित कर इतना विराट गायत्री परिवार वे खड़ा कर गये। ‘‘ईक्षते समदर्शनः’’ योगी को मिलने वाली एक सिद्धि है जिसकी चर्चा गतांक में की गयी थी। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भी मुझे सर्वत्र देखता है, और सब कुछ मेरे अंदर देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और न ही वह मेरे लिए अदृश्य होता है। ब्राह्मी स्थिति की यह झलक हम कबीर, एकनाथ, रैदास, मीरा, रामकृष्ण, एवं स्वयं पूज्यवर में देखते हैं। इसमें साधक द्वैत से अद्वैत की यात्रा करता है उसके विकास के कई नूतन आयाम खुल जाते हैं जो उसे पूर्णत्व की ओर ले जाते हैं। वे वासुदेव ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति के कारण हैं और उन्हीं के कारण यह जगत चेष्टा करता है यह रहस्य जान लेने वाला मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। आगे ३१वें श्लोक में कहते हैं कि जो भी दिव्य कर्मी योगी एकीभाव से समस्त प्राणियों में भगवद्रूप की उपासना करते हैं, वे वर्त्तमान में रहते हुए भी उन्हीं परमेश्वर में निवास करते हैं। एकत्व की प्राप्ति एक सिद्धि है। एवं यह प्राप्त कर लें तो भगवान का आश्वासन मिल जाता है कि साधक उन्हीं में निवास करेगा। इसी व्याख्या को आगे बढ़ाते हैं।

ईश्वर में वास

इकतीसवें श्लोक में भगवान ने जो कहा है, उसे संक्षेप में पुनः देखते हैं- ‘‘जो एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में स्थित मेरी उपासना करता है वह योगी वर्तमान में रहते हुए (सभी प्रकार का निर्वाह करते हुए) भी मुझमें ही वास करता है।’’ यह एक प्रकार से विविधता में एक उस परमात्मा का ही सतत दर्शन है। ऐसा व्यक्ति शरीर, मन, व बुद्धि से परे मात्र आत्मा रूप में ही वास करता है, उसी की सेवा करता है, सभी ओर उसे परमात्मा की- सद्गुरु की उपस्थिति नजर आती है। इस दिव्य अनुभूति के साथ वह २४ घंटे जीवन जीता है, फिर चाहे उसका बहिरंग स्वरूप कैसा भी हो- जनक, रैदास, कबीर, सदन कसाई या दादू जैसा- वह सदैव उसी परमात्म सत्ता में निवास करता है। (सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयिवर्तते) अब उसके द्वारा कोई गलत कदम नहीं उठ सकता। उसे वह मूल स्त्रोत प्राप्त हो गया है जो परम आनंद से भरा पूरा है। उसकी कामनाएँ निःशेष हो गयी हैं। वह किसी से कुछ अपेक्षा नहीं रखता। वह मुक्त हो जाता है सभी बंधनों से एवं पूर्ण पुरुष बन जाता है। वह संसार को सत्य, न मानकर आत्मजागृति प्राप्त कर अपने अंदर ही सत्य की प्राप्ति ईश्वर रूप में कर लेता है। वह जान जाता है कि वह एक पथिक मात्र है- आत्मारूप में। शरीर एक सराय है, गेस्ट हाऊस है उसे मात्र पथिक की, आत्मिक प्रगति की चिंता करनी है, इस क्षणिक ‘‘हाल्ट’’ शरीर से जुड़े राग- द्वेषों में उलझना नहीं है।

ऐसे दिव्यकर्मी ही एक परिपूर्ण आचरण से शिक्षण देने वाले आचार्य, दूवदूत, महामानव, ईश्वरीय मानव कहलाते हैं। उसे सारा संसार अपना ही एक विराट विस्तार दिखाई देता है। सभी ओर उसे परमात्म सत्ता के दर्शन होते हैं। परमात्म चेतना में सतत जीने का उसे लाभ एक निराले रूप में मिलता है। उसके सभी कार्य सहज रूप में होने लगते हैं। उसके कर्म संस्कार रूप में नहीं पकते, उसके लिए वे प्रारब्ध नहीं बनते। उसके कर्म अकर्म बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति के विषय में गीताकार आगे कहते हैं-

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन
सुखं व यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥ ६/३२


शब्दार्थ-

हे अर्जुन (अर्जुन) जो (यः) समस्त भूतों में (सर्वत्र) अपने साथ तुलना करके (आत्मा- उपमन्येन) सुख या दुख, प्रिय और अप्रिय को (सुखं वा यदि वा दुःखं) समान भाव से देखते हैं (समं पश्यति), वही योगी (सःयोगी)श्रेष्ठ होते हैं, ऐसा मेरा मत है (परमः मतः)
भावार्थ- ‘‘हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (अपनी आत्मदृष्टि से) सुख अथवा दुख में सर्वत्र समत्व के ही दर्शन करता है, सभी को समभाव से देखता है, वह योगी परमश्रेष्ठ माना गया है।’’
 
योग की पराकाष्ठा

यहाँ यह बात भलीभाँति समझने योग्य है। जिस योगी ने आत्मा के तत्वरूप में एकत्व का भाव समझ लिया है, उसके लिए सारा संसार उसके निज का विस्तार मात्र हो जाता है। सबके सुख दुख उसके अपने सुख- दुख हो जाते हैं। हमारे किसी भी शरीर के अंग में होने वाली पीड़ा हमें अनुभव होती है- हमारी अपनी लगती है, हम उससे प्रभावित होते हैं। इसी तरह आत्मज्ञानी दिव्यकर्मी जिस ज्ञान अवस्था में पहुँच जाता है, उसमें सारे संसार को वह अपने विराट प्रेम के घेरे में बाँधकर उनका हिस्सेदार बन जाता है। गीता का यह भाग योगी की पराकाष्ठा की स्थिति का द्योतक है जिसमें वह उस महात्मा के सदृश्य दिखाई पड़ता है जिसने सर्वव्यापी आत्मा को अपनी वास्तविक आत्मा के रूप में अनुभव कर लिया है। ध्यान के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा यह योगी सचमुच इस पृथ्वी पर ईश्वरीय मानव बन जाता है।

सभी ओर पवित्रता का भाव

‘सर्वत्र समंपश्यति’’ शब्द को ठीक से समझना होगा। दक्षिणेश्वर में भण्डारा चल रहा था। रामकृष्ण परमहंस के भानजे हृदयनाथ ने पूछा- मामा! योगी कैसा होता है? वही जिज्ञासा जो अर्जुन के मन में स्थितप्रज्ञ के विषय में जागी थी। जैसा व्यक्ति वैसा समाधान। ठाकुर ने कहा- यह योगी है जो सामने बैठा है। निर्विकार भाव से भोजन कर रहा है। भोजन बासी था पर वह उसे उसी भाव से खा रहा था, जैसा स्वाद लेकर एक सामान्य व्यक्ति खाता है। ठाकुर बोले- तू इसके पीछे लगले। यही योगी है। हृदय ने सोचा कि परीक्षा करके देखें कि इसे गुस्सा आता है कि नहीं। उसने पत्थर का ढेला मारकर देखा- योगी को गुस्सा नहीं आया। अब हृदय ने योगी से पूछा कि ज्ञान कैसे प्राप्त होता है- कहाँ से प्राप्त होता है। योगी उसकी मनःस्थिति को जानता था। उसने कहा- तुझे क्या लेना देना ज्ञान से। फिर भी समझ ले- जब गंगा जल के पानी और नाली के पानी में कोई अंतर नहीं दिखाई दे तब आदमी योगी बनता है। यह भाव की उच्चतम स्थिति है। सभी ओर एक जैसा पवित्रता का भाव दिखाई देना। पंचतत्त्वों को भेदकर चेतना जब इस स्थिति में आकर आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाती है तब वह व्यक्ति योगी कहलाता है।

गीताकार का श्लोक क्रमांक ३०- ३१ में एक ही निर्देश है कि मुक्त योगी के लिए एक मात्र विधान यही है कि वह भगवान में रहे- भगवान से प्रेम करे और सब प्राणियों के साथ एकत्व स्थापित कर लें। योगी का लौकिक प्रेम तब आध्यात्मिक प्रेम में बदल जाता है और उसे इन्द्रियानुभव की तुलना में आत्मानुभव होने लगता है। यह प्रेम दिव्य होता है। और ईश्वर प्रेम की नींव पर प्रतिष्ठित होता है। यह अनुभूति उसे निर्भय बना देती है, सब उसे भगवद्रूप दिखाई देता है। वह न तो किसी पदार्थ को नापसंद करता- किसी से घृणा नहीं करता बल्कि जगत में भगवान से और भगवान में जगत से प्रेम करने लगता है। (श्री अरविन्द- गीता प्रबंध- पृष्ठ २५६)

दुख या सुख, सभी में समभाव

आत्मदर्शन की समता की स्थिति में योगी कैसा होता है, इस बात को भगवान समझाते हुए कहते हैं कि वह सब कुछ समभाव से देखता है- चाहे दुख हो या सुख। ऐसा ही साधक परम योगी होता है। वह सब में अपनी आत्मा को, सब में ईश्वर को देखता है और इन सभी के बाह्य रूपों से क्षुब्ध या मुग्ध न होकर करुणा से द्रवित हो उनका दुख दूर करने का उपाय सोचता है। सब प्राणियों के कल्याण में स्वयं को लगाने, लोगों को आध्यात्मिक आनन्द की पराकाष्ठा तक पहुँचाने में, सम्पूर्ण समाज को आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर करने के काम में प्रवृत्त होकर वह आजीवन स्वयं को लगाए रहता है। अपने जीवन को वह दिव्य जीवन बना लेता है। श्री अरविन्द कहते हैं कि ऐसे व्यक्तियों के विषय में ही कहा जाता है कि उनने स्वर्ग को जीत लिया है। परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य एवं ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस का जीवन ऐसा ही कहा जा सकता है। दोनों ने जीवन भर तप किया, स्वयं समिधा की तरह जले और परहितार्थाय- औरों के दुखों को मिटाने हेतु स्वयं को नियोजित किया। वे किसी के ऐश्वर्य से प्रभावित हुए बिना अथवा उसकी द्रवित करुण स्थिति से अप्रभावित रह कर्म करते रहे और त्रिगुणात्मिका माया के सब कर्मों की ओर स्थिर होकर देखते रहे। उद्देश्य उनका एक ही रहा। अपनी ही भाँति संपूर्ण प्राणियों में एक ही परमात्मा को देखना और उन्हें लक्ष्य तक पहुँचाना। यही कारण है कि रामकृष्ण मिशन आज ठाकुर के महाप्रयाण के १२० वर्ष बाद भी एवं पूज्यवर का गायत्री परिवार उनके अवतरण के १०० वर्ष पूरा होते होते उनके सूक्ष्म व कारण स्तर पर वही कार्य सतत करता आ रहा है। लाखों- करोड़ों को आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रवृत्त करता आ रहा है।

भगवत्ता के साथ ऐक्य

छठे अध्याय की इस पराकाष्ठा पर पहुँच कर भगवान व्यक्ति को योग की पराकाष्ठा के रूप में स्थापित करते हैं। (सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः- श्लोक ३१)। जो सब में स्थित भगवान से प्रेम करता है और जिसकी आत्मा सदा सर्वदा भगवत्ता के भाव से उनमें प्रतिष्ठित है, वह चाहे जैसे भी रहे, कर्म करे- भगवान में ही रहता है और कर्म करता है। भगवान के साथ ऐक्य भाव स्थापित करने की बात समझाना ही योगेश्वर का एकमात्र लक्ष्य है एवं इस आत्मसंयम योग रूपी अध्याय में उसे वे ठोंक बजाकर स्थापित करके अंतिम श्लोक में कह भी देते हैं- ‘‘तस्माद्योगी भवार्जुन।’’ यही भागवत रहस्य है जो गीताकार कहना चाह रहा है और इसी के लिये ज्ञान, कर्म, तप, आत्मसंयम आदि उपाय बताए गये हैं।

यह बात बड़ी गहराई से समझ लेना चाहिए कि विश्व के साथ एकत्मता का ज्ञान होना बड़ी दुर्लभ अवस्था है। ऐसी अवस्था पर पहुँचने पर ऐसे महायोगी केवल विश्वभर के मनुष्यों के ही नहीं, सभी प्राणियों के सुख- दुखों का अनुभव अपने अंदर करते हैं और सबके सुख- दुखों के साथ स्वयं को भी जोड़े रहते हैं। दूसरे के पैर में काँटा चुभा तो भी योगी अपने अंतर में उस क्लेश को अनुभव करते हैं। तब ठाकुर रामकृष्ण परमहंस नाँव वाले को चाँटा मारे जाने पर अँगुलियों के निशान अपने गाल पर अनुभव करते हैं। आचार्य श्रीराम शर्मा जी अपने भक्त की टांगों पर तांगे का पहिया गुजर जाने पर उसका दर्द अपनी जाँधों पर महसूस करते हैं और उनके उस स्थान पर नीले निशान भी पड़ जाते हैं। संत ज्ञानेश्वर भैंसे पर मार पड़ती देख उसकी पीड़ा अपने ऊपर अनुभव कर उपस्थित पंडित समुदाय के समक्ष उसी से वेदों का उपदेश भी कहलवा देते हैं। यही विश्वप्रेम आत्मस्वरूप ब्रह्म का सब भूतों में दर्शन रूपी ब्रह्मज्ञान है। यही है ‘‘अहं ब्रह्मास्मि’’ का भाव जो योगी के स्वर में मुखरित ही नहीं होता मूर्तिमान होता दिखाई देता है।

 विश्वप्रेम आत्मा का विस्तार

स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- ‘‘जत उच्च तोमार हृदय, ततो दुःख जानिओ निश्चय’’ अर्थात जितना ऊँचा तुम्हारा मन- हृदय होगा, लोगों के दुःख से तुम्हें उतना ही दुख भोगना होगा। तभी तो स्वामी जी सुदूर फिजी के समीप द्वीप में घटे एक घटना क्रम ज्वालामुखी विस्फोट से प्रभावित हो रात्रि भर बैचेनी में टहलते रहते हैं व इसकी पूर्व सूचना सभी शिष्यों को दे देते हैं। ऐसी मुक्तात्माएँ संसार के समस्त दुखों का स्पन्दन अपने अंदर अनुभव करती हैं। वे अपना सारा जीवन उनकी निवृत्ति हेतु अर्पित कर देती हैं। यह बाहरी प्रेम ही विश्वप्रेम है, जीव सेवा है आत्मानंद का विस्तार है।

ठाकुर के जीवन के प्रसंग

ठाकुर श्री रामकृष्णदेव के जीवन में ऐसे कई घटनाक्रम देखे जा सकते हैं। वे काशी यात्रा पर थे। मार्ग में वैद्यनाथ धाम जाते हुए अकाल से पीड़ित सैकड़ों नर- नारी कंकाल रूप में उनने देखे। रानी रासमणि के दामाद मथुरानाथ बाबू से उनने रोकर कहा- इन्हें भरपेट खिलाओ, नए वस्त्र दो, सिर पर तेल दो। यही सच्ची तीर्थसेवा है। मथुरा बाबू ने बीच में टोका- बाबा! तीर्थ में अनेक खर्च हैं। इतने सारे आदमियों को खिलाने- पिलाने में तो सारा साथ का रुपया खर्च हो जाएगा। ठाकुर रो पड़े- बोले लोग जाओ। मैं काशी नहीं जाऊँगा, मैं इन्हीं के पास रहकर इनकी सेवा करूँगा। लाचारीवश मथुरा बाबू ने सभी को भरपेट खिलाया, जैसा रामकृष्ण चाहते थे वैसा किया। दरिद्रों के मुख पर हँसी देख रामकृष्ण वहाँ से उठ गए और साथ चल पड़े। विश्व भर को अपनी आत्मा के रूप में देखना यही है। औरों के दुख से विचलित हो दुख अनुभव करना यही है। इसी तरह एक बार श्री ठाकुर ने देखा- एक पतंगा उड़ता आया- उसके मलद्वार में तिनका बँधा था। इसे देखकर वे काफी देर तक वेदना से अधीर बने रहे। दक्षिणेश्वर की काली बाड़ी के बगीचे में लगी नयी दूब पर से एक व्यक्ति पैदल चला आ रहा था। देखकर ठाकुर असह्य यंत्रणा अनुभव करने लगे। बाद में वे बोले- देखो! छाती पर से कोई मनुष्य चला जाए तो जैसी तीव्र वेदना की अनुभूति होती है वैसा ही दर्द मैंने अनुभव किया था यह अनुभूति उनकी दो घंटे तक बनी रही। पूजा के लिए एक बार बेल- दूब चुनने गए श्री ठाकुर को लगने लगा कि सर्वत्र वही चैतन्य विद्यमान है। बेलपत्ती तोड़ते समय पेड़ की छाल साथ निकल आयी। उस समय वृक्ष को जो वेदना का अनुभव हुआ- वह उन्हें भी हुआ। उसके बाद वे बेलपत्ती चुन नहीं सके। ऐसे कई प्रसंग उनके जीवन के हैं।

पूज्यवर के जीवन के घटनाक्रम

कसाई द्वारा बैल को कसाई घर ले जाते समय परम पूज्य गुरुदेव ने अपनी युवावस्था में (लगभग सत्रह वर्ष आयु) उसे मुक्त करा अन्य बैल न होने की विवशता में खुद हल में दूसरे के स्थान पर जुतकर लगभग बीस मील दूर आश्रित गृह पहुँचाया था, जहाँ उसके प्राणों की रक्षा हो गई। बिल्ली द्वारा कबूतर मुँह में लेकर भाँगते समय उनने कबूतर को बचाया, उसकी मरहम पट्टी कर उसे मुक्त किया था। दहेज में बहुओं के जलने के समाचार पढ़कर वे क्षुब्ध हो जाते थे- गला रुँध जाता था व कहने लगते थे, कब वह समय आएगा जब ये घटनाएँ रुकेंगी, आदर्श विवाहों की शृंखला चलेगी और नारी सशक्तीकरण होगा। उनके जीवन का बड़ा भाग इसी निमित्त लग गया। उनने उसे एक विराट आन्दोलन का रूप दिया। उनकी इच्छा थी कि गायत्री परिवार में ही उनसे जुड़े लाखों परिजन अन्तर्जातीय विवाह द्वारा जुड़ें बजाय बेमेल- धन आधारित कामज विवाह द्वारा कर्ज से लदें अथवा बच्चियों की अविवाहित स्थिति से आत्महत्या करलें या अल्पायु में ही काल कवलित हो जाएँ। ऐसी स्थिति अब उनके उत्तराधिकारियों द्वारा लायी जा रही है जहाँ दहेज रूपी दानव से वे समाज को पूर्णतः मुक्त करने जा रहे हैं।

स्वयं पूज्यवर अपने १९७१- ७२ में लिखे सम्पादकीय (अपनों से अपनी बात- ‘‘हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ’’- बाद में ‘‘सुनसार के सहचर’’ रूप में पुस्तकाकार में सम्पादित) में लिखते हैं- ‘‘हमारी साधना ने विश्व मानव की पीड़ा को अपनी पीड़ा बना दिया। लगने लगा- मानों अपने ही पाँवों को कोई ऐंठ- मरोड़ और गला दबा रहा हो। सबमें अपनी आत्मा पिरोई हुई है और सब अपनी आत्मा में पिरोये हुए हैं- गीता का यह वाक्य जब अनुभूति की भूमिका में उतरे और अन्तःकरण में प्रवेश करने लगे तो स्थिति दूसरी हो जाती है। अपने अंग- अवयवों का कष्ट अपने को जैसा व्यथित बैचेन करता है, अपनी स्त्री, पुत्र- पुत्रियों की पीड़ा जैसे चित्त को विचलित करती है ठीक वैसे आत्मविस्तार की दिशा में बढ़ चलने पर लगता है कि विश्वव्यापी दुख अपना दुख है और व्यथित- पीड़ित की वेदना अपने को नोंचती है।’’

विश्वमानव की पीड़ा उनकी अपनी पीड़ा बनी

कितनी स्पष्ट अभिव्यक्ति है। बिल्कुल गीता के श्लोक क्र० २९, ३०, ३१, ३२ का प्रतिध्वनित करती हुई। सचमुच वैसा ही जीवन उनने जिया। विदाई की वेला में (जून १९७१)। उनकी यह व्यथा बार- बार उभरती रही। वे लिखते हैं- ‘‘हमें अपने सुख- साधन जुटाने की फुरसत कहाँ रही। विलासिता की सामग्री जहर सी लगती रही। विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आयी तो आत्मग्लानि ने उस क्षुद्रता को धिक्कारा जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी के एक गिलास को अपने पैर धोने की विडम्बना में बिखेरने के लिए ललचाती है। भूख से तड़पते प्राण- त्यागने की स्थिति में पड़े बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर माता कैसे अपना भरा पेट और भरे? दर्द से कराहते बालक से मुँह मोड़कर पिता ताश- शतरंज का साज कैसे सजाए? ऐसा कोई निष्ठुर ही कर सकता है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की संवेदना जैसे ही प्रखर हुई निष्ठुरता उसी क्षण जल- जलकर नष्ट हो गयी।’’

इतनी ऊँचाई तक पहुँचा चिन्तन ही गीता के योगी को स्थापित करता है। ध्यान का यह सर्वोच्च शिखर है। इस चमत्कारी वर्णन को सुनकर अर्जुन लगभग हतप्रभ है। उनके अंदर पुनः शंकायें उठती हैं।
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