विकृत चिन्तन-रोग शोक का मूलभूत कारण

महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि कोई व्यक्ति कितनी लम्बी जिन्दगी जीता है । महत्त्वपूर्ण यह है कि उसका जीवन कितना सार्थक और सोद्देश्य है। साधन-सुविधा-सम्पन्न लम्बा जीवन भी एक दुर्बह भार बन जाता है । यदि उसके साथ आदर्श और सिद्धान्त न हों तो और अब तो यह भी अनुभव किया जाने लगा है व्यक्ति अपने जीवन की व्यर्थता से इतना ऊब भी सकता है कि किसी भी क्षण आत्महत्या का निश्चय कर बैठे । गौरव और गरिमा तो इस बात में है व्यक्ति उच्च मानवी आदर्शों उत्कृष्ट आस्थाओ तथा आदर्शवादी मान्यताओं को अपनाते हुए आत्मा की उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहे । तभी जीवन का आनन्द है और जीने में संतोष है । अन्यथा उद्देश्य को भुलकर की गयी यात्रा का अन्त कही होगा, यात्री उसमें अपने आपको कहाँ नष्ट कर लेगा अथवा कब अपनी यात्रा को व्यर्थ समझकर खीझ उठेगा; कहना कठिन है।

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