सावधानी और सुरक्षा

सावधानी और सुरक्षा

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गायत्री मंत्र का बीसवाँ अक्षर 'न' सदैव सावधानी रखने और अपनी रक्षा को उचित व्यवस्था करने की शिक्षा देता हैं-

न: श्रण्वेकामिमां वार्ता सदाभव । स्वपमाणं नरं नूनं ह्याक्रामन्ति विपक्षिणः।।

अर्थात्-"इस शिक्षा को ध्यानपूर्वक सुनो कि ''सदा सावधान रहना चाहिए । असावधान मनुष्य पर ही शत्रुगण प्राय: आक्रमण कर देते हैं ।"

असावधानी, आलस्य, बेखबरी अदूरदर्शिता ऐसी भूले हैं जिन्हें अनेक प्रकार की आपत्तियों का उद्गम स्थल कह सकते हैं । गफलत में रहने वाले पर किसी भी तरफ से हमला हो सकता है । असावधानी में एक ऐसा दूषित तत्व पाया जाता है कि उसके फल से अनेक प्रकार की हानियाँ एवं विपत्तियाँ एकत्रित हो जाती हैं ।

असावधान आलसी मनुष्य एक प्रकार का अर्द्धमृत है । मरी हुई लाश को पड़ी हुई देखकर जैसे चली, कौए, कुत्ते, सियार गिद्ध आदि दूर-दूर से दौड़ कर जमा हो जाते हैं, वैसे ही असावधान मनुष्य के ऊपर आक्रमण करने वाले तत्व कहीं न कहीं से आकर घात लगाते हैं । जो स्वास्थ्य-रक्षा के लिए जागरूक नहीं है उसे देर-सबेर में बीमारियाँ आ दबोचेंगी । जो नित्य आने वाले उतार-चढ़ावों से बेखबर रहता है वह किसी दिन दिवालिया बन कर रहेगा । जो काम क्रोध लोभ, मोह, मद, मत्सर सरीखे मानसिक शहरों की गतिविधियों की ओर से आँखें बन्द किए रहता है वह कुविचारों और कुकर्मों के गर्त में गिरे बिना न रहेगा । जो दुनियाँ के छल, फरेव, ठगी, लूट, अन्याय, स्वार्थपरता, शैतानी आदि की ओर से सावधान नहीं रहता उसे उल्लू बनाने वाले, ठगने वाले, सताने वाले अनेकों पैदा हो जाते हैं । जो जागरूक नहीं, जो अपनी रक्षा के लिए प्रयत्नशील नहीं रहता, उसे दुनियाँ के शैतानी तत्व बुरी तरह नोंच खाते हैं ।

इसलिए अन्य सद्गुणों और हितकारी शक्तियों के साथ मनुष्य में सावधानता का गुण रहना भी अत्यावश्यक है । विवेकपूर्वक त्याग करना और उदारता से परोपकार करना तो उचित है पर अपनी बेवकूफी अथवा असावधानी से दुष्ट लोगों का शिकार बनना सर्वथा अवांछनीय और पापमूलक है । जहाँ इच्छाओं की ओर प्रयत्न करना आवश्यक है वहाँ बुराई से सावधान रहने बचने और उनसे संघर्ष करने की भी आवश्यकता है ।


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