पातंजलि योग का तत्त्व- दर्शन

उत्कर्ष के लिए आवश्यक धर्म धारणाएँ

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धारणा अर्थात् अन्तःकरण की गहराई में धर्म धारणाओं को स्थापित करना। देखा जाता है कि मनुष्य कटी पतंग की तरह हवा के झोंकों के साथ दिशा बदलता रहता है। शरीरगत वासनाएँ और मनोनीत तृष्णाएँ ही हर घडी़ सवार रहती हैं, उन्हीं की पूर्ति के लिए निरन्तर ताना- बाना बुनने में लगा रहता है। उन्हीं के लिए खटता पिसता रहता है। कुछ सफलताएँ विशेषताएँ उपलब्ध हुईं तो अहमन्यता का भूत सवार होता है। दूसरों पर दर्प जमाने के लिए ठाठ- बाट रोपता और अपव्यय तथा आतंक की नीति अपनाकर अपने को बडा़ सिद्ध करने के प्रयासों में लगा रहता है। इन्हीं विडम्बनाओं में उलझते- सुलझते जीवन का अन्त हो जाता है।

जिनकी अपनी निजी धारणाओं में विवेकशीलता जुडी़ हुई है ऐसे कम ही लोग दीख पड़ते हैं। अधिकांश तो लकीर के फकीर होते हैं। प्रचलनों का अनुकरण करते रहते हैं। कुरीतियाँ चाहें कितनी ही अहितकर अनुपयुक्त क्यों न हों संगी साथियों के द्वारा अपनाये जाने पर अपने लिए भी अनुकरण का विषय बन जाती हैं। अनुकरणप्रियता मनुष्य का स्वभाव है, पर इस क्षेत्र में भी यह सोचा जाना चाहिए कि क्या दृढ़तापूर्वक अपनाया जाय यह भी पूर्व निर्धारण के अभाव में ठीक तरह नहीं बन पड़ता। परिस्थितियों के अनुरूप विचार ही नहीं आचरण भी बदलते रहते हैं। अवसरवादिया ही नहीं नीति बनकर रह जाती है। बेपेंदी के लोटे की तरह जहाँ भी जिस प्रकार भी स्वार्थ सिद्ध होता दीखता है उधर ही अपने को बदल लेते हैं, वातावरण को अपने ढाँचे में ढाल सकने की मनःस्थिति तो किन्हीं बिरलों में ही होती है। अधिकांश परिस्थितियों ले अनुरूप अपना मन बदलते रहते हैं। तितली की तरह आकर्षण के प्रलोभन में इस फूल से उस उस फूल पर उड़ते- फिरते हैं। उनका अपना कोई लक्ष्य, निर्धारण या गन्तव्य नहीं होता है। इस प्रकार के व्यक्तियों की न कोई दिशा धारा होती है और न सुनिश्चित क्रिया- पद्धति। परिस्थितियाँ ही उन्हें हवा के झोंके की तरह जहाँ तहाँ लिए फिरती हैं। ऐसी दशा में न कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नियमित रूप से करते बन पड़ता है और न किसी सराहनीय सफलता का श्रेय उन्हें मिल पाता है।

प्रेरणाएँ अन्तःकरण से उभरती हैं उन्हीं के आधार पर विचारणा काम करती है। योजना बन पड़ती है और इच्छा की पूर्ति करने के उद्देश्य से क्रिया चल पड़ती है, इसलिए इच्छाओं की पूर्ति ही जीवन का स्वरूप बनकर रह जाती है। परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाकर व्यक्ति स्वार्थ साधना के प्रयत्नों में लगे रहकर अपना आयुष्य बिता देता है। जिनका कोई उद्देश्य नहीं होता, उनसे कुछ क्रमबद्ध रूप से करते- धरते भी नहीं बन पड़ता। इस स्थिति को एक प्रकार से निष्फल जीवन ही कह सकते हैं। जितनी महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ उसे उपलब्ध हुई हैं, उसकी तुलना में शतांश भी वैसा कुछ नहीं होता जिस पर कि सन्तोष किया जा सके।

इस उथले स्तर के जीवन- यापन के पीछे एक ही कमी काम करती है, वह है अन्तःकरण में आदर्शवादी आस्थाओं का अभाव। यदि उपलब्ध सुर दुर्लभ अवसर का महत्त्व समझा जा सके और उसे महत्त्वपूर्ण कामों में लगाने का निर्धारण किया सके तो फिर आदर्शों की उत्कृष्टता से अन्तराल को सराबोर करने की बात ही प्रमुख होती है। इसके लिए उसी स्तर का स्वाध्याय, सत्संग, वातावरण एवं सहयोग तलाशना पड़ता है। इस घेराबंदी में ही किसी उच्चस्तरीय दिशा धारा को दृढ़तापूर्वक अपनाना पड़ता है। संकल्प उभरता है, मार्ग बनता है और उस पर दृढ़तापूर्वक चल पड़ना सम्भव होता है। अन्यथा मन की चंचलता ही प्रधान बनकर रह जाती है। उस बन्दरवृत्ति से कौतुक कौतूहल ही होते रहते हैं। कुछ ऐसा नहीं बन पड़ता जिसे अनुकरणीय कहा जा सके, सराहा जा सके और उसका अनुकरण करने की किसी के मन में उमंग उठ सके।

मनुष्य जीवन महान सृजेता की महान कलाकृति है। उसे पेट प्रजनन जैसे पशु प्रयोजनों में ज्यों- त्यों करके पूरा कर लेना ही वह कार्य नहीं है जिसे कर्मयोग कहा गया है और जिसके द्वारा कर्मरत होते हुए भी चरम लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सकता है।

शारीरिक कृत्यों का स्वरूप दृष्टिगोचर तो होता है, प्रस्तुत की गई घटनाओं का वर्णन होता है पर पर्दा उठाकर देखा जाय तो प्रतीत होगा कि घडी़ के अनेक पुर्जे जो एक दूसरे के सहयोग से कार्यरत हो रहे हैं उसके पीछे फिनर वाली चाबी ही काम करती है। चाबी भरी होती है तो घडी़ के पुर्जे चलते रहते हैं। अन्यथा वे भावनात्मक प्रेरणा के अभाव में शिथिल पड़ते- पड़ते सो जाते हैं। आगे धकेलने का जो काम फिनर वाली चाबी करती है, उसी प्रयोजन की पूर्ति मानव जीवन में धारणाओं के द्वारा बन पड़ती है।

आदर्शवादी उन मान्यताओं को धर्मधारणा कहते हैं, जिनमें निश्चय से पूर्व तो उसकी गहराई पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर लिया जाय। सभी शंका- कुशंकाओं पर विचार हो ले। किन्तु जब निष्कर्ष निकाल ही लिया जाय तो उसे सुदृढ़ विश्वास के रूप में हृदयंगम किया जाना चाहिए। उसकी पूर्ति के लिए जितना भी बन पडे़ नित्य कुछ न कुछ करना चाहिए। विश्वासों में क्रिया से बल मिलता है, अन्यथा प्रयोजन में न आने वाले विचार कल्पना मात्र बनकर रह जाते हैं और प्रवाह के साथ जिधर से विधर चले जाते हैं। स्थायित्व लाना हो, मन्तव्य सुनिश्चित और सुदृढ़ करना हो तो आवश्यक है कि संकल्पों को ध्यान में रखा जाय और उन्हें कार्य रूप में परिणत करने का जो भी अवसर सामने आये उसे हाथ से न जाने दिया जाय। कर्तव्य स्वभाव का अंग बन जाता है तो आदतें उस प्रकार के क्रिया- कलाप के लिए अवकाश भी प्राप्त कर लेती हैं और अवसर भी निकाल लेती हैं।

व्यक्तित्व को विश्वास बनाता है। या अधिकांश लोग अनास्थावान होते हैं। वे तार्किक दृष्टि से भी किसी भी विषय का धुआँधार प्रतिपादन कर सकते हैं पर जब उन्हीं सिद्धान्तों को निजी जीवन में कार्यान्वित करने का अवसर आता है तो अपने ही प्रतिपादनों को भूल जाते हैं और वह करने लगते हैं जिनका वे भावना के उभार में स्वयं ही खंडन करते रहे हैं।

मान्यताएँ, भावना क्षेत्र की गहराई में उगती हैं। पर वे चिरस्थायी रहती हैं। वस्तुतः जीवन में जो कुछ महत्त्वपूर्ण है वह सब आस्थाओं के ऊपर निर्भर है। अपने को उत्कृष्ट, निकृष्ट, दुर्बल मान बैठना अपने विश्वासों के ऊपर ही अवलम्बित है। यात्रा पर जीवन जीने वाले घुमन्तू गाडी़ वाले अपने उस ढर्रे को अपनाये रहकर दूसरों की तुलना में कहीं अधिक कठिनाईयाँ स्वीकार करते हैं, पर वे सुविधा साधन मिलने पर भी उस रीति- नीति को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते हैं। उनका कहना है कि वे मेवाड़ के राणा की सन्तानें हैं। जब तक दिल्ली पर राणाओं का झण्डा न फहरेगा तब तक इसी स्थिति में भ्रमण करते रहेंगे। यद्यपि अब उनके उस कथन का कोई तात्पर्य नहीं रहा। फिर भी विश्वास तो विश्वास ठहरा। वह मनुष्य का सबसे समर्थ तत्व है। मान्यताओं के आधार पर मनुष्य कष्ट साध्य जीवन जी सकता है। सामने प्रस्तुत अन्य सुविधाओं को सहज ही ठुकरा सकता है। कुमारियाँ अपना कौमार्य व्रत और विधवाएँ अपना वैधव्य इसी आधार पर भली प्रकार निबाह लेती हैं। न्यायनिष्ठा, परोपकारी, ईमानदार स्तर के व्यक्ति अनेक आकर्षणों और दबावों के आगे न झुककर अपनी प्रतिज्ञाओं पर आरूढ़ बने रहते हैं। प्रतिकूलताएँ उन्हें इस व्रत से डिगा नहीं पातीं।

धारणाएँ, आस्थाएँ तभी सराहनीय बनती हैं। जब वे आदर्शवाद के साथ जुडी़ हुई हों। अन्यथा दुर्व्यसनी भी हेय स्तर की मान्यताएँ बनाये रहते हैं। दुराग्रही भी यही करते रहते हैं। दीन, हीनों में से अनेक लोग अपना भाग्य मान लेते हैं और उसमें सुधार लाने के प्रयत्न छोड़ बैठते हैं। धारणाएँ, अन्ध- विश्वास भरी हो सकती हैं, पर जिन्हें अध्यात्म मार्ग में सहायक माना गया है वे आस्तिकतावादी अध्यात्मवादी और धर्मावलम्बी मान्यताएँ ही हैं। इन्हीं के सहारे ऊँचा उठा और बढा़ जा सकता है।

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