गृहस्थ योग से परम पद

पुण्य और पाप किसी कार्य के बाह्य रूप से ऊपर नहीं वरन् उस काम को करने वाले की भावना के ऊपर निर्भर है। किसी कार्य का बाहरी रूप कितना ही अच्छा, ऊंचा या उत्तम क्यों न हो परन्तु यदि करने वाले की भीतरी भावनाएं बुरी हैं तो ईश्वर के दरबार में वह कार्य पाप में ही शुमार होगा। लोगों को धोखा दिया जा सकता है, दुनियां को भ्रम या भुलावे में डाला जा सकता है परन्तु परमात्मा को धोखा देना असंभव है। ईश्वर के दरबार में काम के बाहरी रूप को देखकर नहीं वरन् करने वाले की भावनाओं को परख कर धर्म अधर्म की नाप तोल की जाती  है।

आज हम ऐसे अनेक धूर्तों को अपने आस पास देखते हैं जो करने को तो बड़े बड़े अच्छे काम करते हैं पर उनका भीतरी उद्देश्य बड़ा ही दूषित होता है। अनाथालय, विधवाश्रम, गौशाला आदि पवित्र संस्थानों की आड़ में भी बहुत से बदमाश आदमी अपना उल्लू सीधा करते हैं। योगी, महात्मा साधु, संन्यासी का बाना पहने अनेक चोर डाकू लुच्चे लफंगे घूमते रहते हैं। यज्ञ करने के नाम पर, पैसा बटोर कर कई आदमी अपना घर भर लेते हैं। बाहरी दृष्टि से देखने पर अनाथालय, विधवाश्रम, गौशाला चलाना, साधु, संन्यासी, महात्मा उपदेशक बनना, यज्ञ, कुआं, मन्दिर बनवाना आदि अच्छे कार्य हैं, इनके करने वाले की भावनाएं विकृत हैं तो यह अच्छे काम भी उसकी मुख्य सम्पदा में कुछ वृद्धि न कर सकेंगे। वह व्यक्ति अपने पापमय विचारों के कारण पापी ही बनेगा, पाप का नरक मय दंड ही उसे प्राप्त होगा।

यदि कोई आदमी साधारण काम करता है। मामूली व्यक्तियों की तरह जीवन यापन करता है, किन्तु उन साधारण कार्यों में भी उद्देश्य, मनोभाव और विचार ऊंचे रखता है तो वह साधारण काम भी तपस्या जैसा पुण्य फलदायक हो जाता है। यहीं तक नहीं—बल्कि यहां तक भी होता है कि बाहर से दिखने वाले अधर्म युक्त कार्य भी यदि सद्भावना से किये जाते हैं तो वे भी धर्म बन जाते हैं। जैसे हिंसा करना, किसी के प्राण लेना, हत्या या रक्तपात करना प्रत्यक्ष पाप है। परन्तु आततायी, दुष्ट और दुरात्माओं से संसार की रक्षा करने की सद्भावना से यदि दुष्टों को मारा जाता है तो वह पाप नहीं वरन् पुण्य बन जाता है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए प्रोत्साहित करके हजारों मनुष्यों को मरवा डाला पर इससे अर्जुन या कृष्ण को कुछ पाप नहीं लगा। राम रावण युद्ध में बहुत बड़ा भारी जन संहार हुआ परन्तु उन दुष्टों को मारने वाले पापी या हत्यारे नहीं कहलाये। यहां हिंसा प्रत्यक्ष है तो भी हिंसा करने वाले सद्भावना युक्त थे इसलिए उनके कार्य पुण्यमय ही हुए। इसी प्रकार झूठ, चोरी, छल आदि भी समयानुसार—सद् उद्देश्य से किये जाने पर धर्ममय ही होते हैं। उन्हें करने वाले को पाप नहीं लगता वरन् पुण्य फल ही प्राप्त होता है।

उपरोक्त पंक्तियों को पढ़कर पाठकों को किसी भ्रम में न पड़ना चाहिए। हम सत्कर्मों की निन्दा या असत् कार्यों की प्रशंसा नहीं कर रहे हैं। हमारा तात्पर्य तो केवल यह कहने का है कि काम का बाहरी रूप कैसा है, इससे दुनियां की स्थूल दृष्टि ही कुछ समय के लिए चकाचौंध में पड़ सकती है पर परमात्मा प्रसन्न नहीं हो सकता। आत्मा और परमात्मा के समक्ष तो भावना प्रधान है। संसार के लोगों की सूक्ष्म बुद्धि भी भावना को ही महत्व देती है। यदि किसी ने अपने किसी स्वार्थ-साधन के लिये कोई प्रीति भोज दिया हो या और कोई ऐसा काम किया हो तो जब लोगों को असली बात का पता चलता है तो लोग उसकी चालाकी के लिये मन ही मन मुसकराते हैं, कनखिया लेते हैं और मसखरी उड़ाते हैं, धर्मात्मा की बजाय उसे चालक ही समझा जाता है। अब दूसरी ओर चलिये किसी आदमी द्वारा भूल से, मजबूरी से, या गैर जानकारी से कोई अनुचित बात हो जाती है और जानकारी होने पर पता चलता है तो उस अनुचित बात के लिये भी क्षमा कर दिया जाता है। अदालतें भी अपराधी की नीयत पर मुख्यतया ध्यान रखती है। यदि अपराधी की नीयत बुरी न साबित हो तो अपराधी को कठोर दंड का भागी नहीं बनना पड़ता।
जीवन के हर एक काम की अच्छाई, बुराई कर्ता की भावना के अनुरूप होती है जीवन भले ही सादा हो पर यदि विचार उच्च हैं तो जीवन भी उच्च ही माना जायेगा। रुपये-पैसे या काम के बड़े आडम्बर से पुण्यफल का विशेष सम्बन्ध नहीं है। एक अमीर आदमी रुपये के बल से बड़े-बड़े ब्रह्मभोज, पाठ-पूजा, तीर्थ-यात्रा, कथा-पुराण, मन्दिर-मठ, कुआं-बावड़ी, सदावर्त, यज्ञ-हवन आदि की व्यवस्था आसानी से कर सकता है। दस लाख रुपया अनुचित रीति से कमा कर दस हजार रुपया इस प्रकार के कार्यों में लगाकर धर्मात्मा बनता है। दूसरी ओर एक गरीब आदमी जो ईमानदारी की मेहनत मजदूरी करता है, वह थोड़े से पैसे कमाता है जिससे कुटुम्ब का भरण-पोषण कठिनाई से हो पाता है बचता कुछ नहीं, ऐसी दशा में वह बेचारा भला ब्रह्मभोज, तीर्थ-यात्रा, यज्ञ अनुष्ठान आदि की व्यवस्था किस प्रकार कर पावेगा? यदि वह नहीं कर पाता है तो क्या वह धर्महीन ही रह जायेगा? क्या दुनिया की भौतिक चीजों की भांति ही पुण्यफल भी रुपयों से ही खरीदा जाता है?

इन प्रश्नों की मीमांसा करते हुए पाठकों को यह बात भली प्रकार हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि— पुण्य का पैसे से कोई सम्बन्ध नहीं है। पुण्य तो भावना से खरीदा जाता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में रुपयों की तूती नहीं बोलती वहां तो भावना की प्रधानता है। दम्भ, अहंकार, नामवरी, वाहवाही, पूजा, प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के लिए धर्म के नाम पर करोड़ रुपये खर्च करने पर भी उतना पुण्य फल नहीं मिल सकता जितना कि आत्म-त्याग, श्रद्धा एवं सच्चे अन्तःकरण से रोटी का एक टुकड़ा देने पर प्राप्त होता है। स्मरण रखिये—सोने की सुनहरी चमक और चांदी के मधुर चमचमाहट आत्मा को ऊंचा उठाने में कुछ विशेष सहायक नहीं होती। आत्मिक क्षेत्र में गरीब और अमीर का दर्जा बिल्कुल बराबर है, वहां उसके पास समान वस्तु है—समान साधन है। भावना हर अमीर गरीब को प्राप्त है, उसी की अच्छाई बुराई के ऊपर पुण्य-पाप की सारी दारोमदार है। घटनाओं का घटाटोप, चौंधिया देने वाला प्रदर्शन, बड़े-बड़े कार्यों के विराट आयोजन रंगीन बादलों से बने हुए आकाश चित्रों की भांति मनोरंजक तो हैं पर उनका अस्तित्व कुछ नहीं। सच्चे हृदय से किये हुए एक अत्यन्त छोटे और तुच्छ दीखने वाले कार्य का जितना महत्व है उतना दम्भपूर्ण किये हुए बड़े भारी आयोजन का किसी प्रकार नहीं हो सकता। ‘‘भावना की सच्चाई और सात्विकता के साथ आत्म-त्याग और कर्तव्य पालन’’ यही धर्म का पैमाना है। इस भावना से प्रेरित होकर काम करना ही पुण्य है। सद्भावना जितनी ही प्रबल होगी आत्म-त्याग उतना ही बड़ा होगा। पैसे वाला अपने पैसे को लगावेगा, जी खोलकर सत्कार्य में लगावेगा, इसी प्रकार गरीब के पास जो साधन हैं उसको ईमानदारी के साथ खर्च करेगा।

लोग ऐसा समझते हैं कि धर्म-धारणा के लिए, पुण्यफल प्राप्त करने के लिए, आत्मोन्नति के लिए, ईश्वर प्राप्ति के लिए, स्वर्ग या मुक्ति की उपलब्धि के लिए, किन्हीं विशिष्ट, विचित्र या असाधारण कार्यों का आयोजन करने की आवश्यकता होती है। अमुक  प्रकार की वेश-भूषा, अमुक प्रकार का रहन-सहन, अमुक प्रकार का साधन भक्तिप्रद हैं यह मानना बिल्कुल गलत है। वेश-भूषा, रहन-सहन, साधक की सुविधा के लिए है, जिससे उसे आसानी रहे, इनके द्वारा सिद्धि किसी को नहीं मिलती। यदि वेष या रहन-सहन से ही सिद्धि मिलती होती तो आज के साधु नामधारी लाखों कर्महीन भिखमंगे इधर-उधर मारे मारे फिरते हैं मुक्ति के अधिकारी हो गये होते। अनेक प्रकार की आत्मिक साधनाऐं, अनेक प्रकार के मानसिक व्यायाम हैं जिनके द्वारा मनोभूमि को, भावना-क्षेत्र को निर्मल, पवित्र एवं सात्विक बनाया जाता है। आत्मोन्नति की असंख्यों साधनाऐं हैं सभी लाभप्रद हैं; क्योंकि किसी भी रास्ते से सही भावना को उच्च बनाना है, यदि मनोभूमि उच्च न बने तो साधना निरर्थक है। साधना एक औजार मात्र है। उसको विवेकपूर्वक काम में लाने से इच्छित वस्तु का निर्माण हो सकता है। पर यदि विवेकपूर्वक न किया हो तो साधक निरर्थक है। अमुक पुस्तक का पाठ करने, मन्त्र जपने या अभ्यास करने से यदि मनोभूमि निर्मल बनती हो तो आत्मोन्नति होगी पर रूढ़ि की तरह अन्धविश्वासपूर्वक अविवेक के साथ किसी मन्त्र या पुस्तक को रटते रहा जाय, अमुक प्रकार से काया-कष्ट सहते रहा जाय तो उससे कुछ प्रयोग सिद्ध नहीं होता। जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करना आत्मिक प्रगति द्वारा ही संभव है। उस पवित्रता के लिये अनेकों असंख्यों साधन हैं। जिनमें से देश, काल, पात्र को देखते हुए बुद्धिमान व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त वस्तु चुन लिया करते हैं। जैसे एक ही कसरत सबके लिए अनिवार्य नहीं है उसी प्रकार एक ही साधन हर ममक्ष के लिये आवश्यक नहीं है। शरीर, ऋतु, खुराक, पेशा आदि को देखकर ही चतुर व्यायाम विशारद अपने शिष्यों को भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यायाम कराते हैं, उसी प्रकार आत्म-तत्वदर्शी आचार्य भी असंख्यों योगों में से उपयुक्त योग का अपने अनुयायियों के लिए चुनाव करते हैं।

कुछ विशिष्ठ व्यक्तियों को छोड़कर साधारण श्रेणी के सभी पाठकों के लिए हम गृहस्थ योग की साधना को बहुत ही उपयुक्त, उचित, सुलभ एवं सुख साध्य समझते हैं। गृहस्थ योग की साधना भी राजयोग, जपयोग, लययोग, आदि की ही श्रेणी में आती है। उचित रीति से इस महान व्रत का अनुष्ठान करने पर मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। जैसे कोलतार पोत देन पर हर वस्तु काली और कलई पोत देने पर सफेद हो जाती है उसी प्रकार योग की, साधना की, परमार्थ की, अनुष्ठान की दृष्टि रखकर कार्य करने से वे कार्य साधनामय परमार्थ प्रद हो जाते हैं। अहंकार, तृष्णा, भोग, मोह आदि का भाव रखकर कार्य करने से उत्तम से उत्तम कार्य भी निकृष्ट परिणाम उपस्थित करने वाले होते हैं। घर गृहस्थी के संस्थान को सुव्यवस्थित रूप से चलाने में भावनाएं यदि ऊंची, पवित्र, निस्वार्थ और प्रेममय रखी जावें तो निस्संदेह यह कार्य अतीव सात्विक एवं सद्गति प्रदान करने वाला बन सकता है। अपना आत्मा ही अपने को ऊंचा या नीचा ले जाता है यदि आत्म-निग्रह, आत्म-त्याग, आत्मोत्सर्ग के साथ अपने जीवन-क्रम को चलने दिया जाय तो इस सीधे-साधे तरीके की सहायता से ही मनुष्य परम पद को प्राप्त कर सकता है।