गायत्री का ब्रह्मवर्चस

गायत्री उपासना से ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति आत्मा में सन्निहित ब्रह्मवर्चस का जागरण करने के लिए गायत्री उपासना आवश्यक है ।। यों सभी के भीतर सह- तत्व बीज रूप में विद्यमान है पर उसका जागरण जिन तपश्चर्याओं द्वारा सम्भव होता हैं, उनमें गायत्री उपासना ही प्रधान है ।हर आस्तिक को अपने में ब्रह्म तेज उत्पन्न करना चाहिए ।। जिसमें जितना ब्रह्म- तत्व अवतरित होगा, वह उतने हो अंशों में ब्राह्मणत्व का अधिकारी होता जायेगा। जिसने आदर्शमय जीवन का व्रत लिया है, व्रतबंध, यज्ञोपवीत धारण किया है, वे सभी व्रतधारी अपनी आत्मा में प्रकाश उत्पन्न करने के लिए गायत्री उपासना निरन्तर करते रहें, यही उचित है ।। जो इस कर्त्तव्य से च्युत होकर इधर- उधर भटकते है, जड़ को सींचना छोड़कर पत्ते धोते फिरते है, उन्हें अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त करने में बिलम्ब ही नहीं, असफलता का भी सामना करना पड़ता है ।। साधना शास्त्रों में निष्ठावान भारतीय धर्मानुयायियों को, द्विजों को एक मात्र गायत्री उपासना का ही निर्देश किया गया है ।। उसमें वे अपना ब्रह्मवर्चस आशाजनक मात्रा में बढ़ा सकते है और उस आधार पर विपन्नता एवं आपत्तियों से बचाते हुए सुख शान्ति के मार्ग पर सुनिश्चित गति से बढ़ते रह सकते हैं ।। द्विजत्व का व्रत- बंध स्वीकार

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