गायत्री ही कामधेनु है

ब्रह्मविद्या का मूल गायत्री

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मनुष्य की अंतरंग स्थिति को सुसंस्कृत बनाने में समर्थ सभी साधनाओं में गायत्री का सर्वोपरि स्थान है ।। उसकी उपासना बहिरंग परिस्थितियों को समुन्नत बनाने की दृष्टि से भी अति समर्थ है ।। दोनों ही दृष्टियों से उसकी गरिमा एवं उपयोगिता को देखते हुए अध्यात्मवेत्ताओं ने उसे परम सर्वोपरि और सर्वोत्कृष्ट एक ऐसा आधार बताया है जिसके सहारे सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकना सम्भव बनता है ।।

यों अपने स्थान पर सभी तत्त्वज्ञान एवं उपासनात्मक विधि- विधान महत्त्वपूर्ण है, पर तुलनात्मक अध्ययन करने पर ब्रह्मवेत्ताओं ने वरिष्ठता के निष्कर्ष निकाले हैं, उन्होंने गायत्री को परम कहा है और बताया गया है कि उसकी सार्थकता एवं समर्थता पर संदेह करने की आवश्यकता नहीं है ।। शास्त्रकार कहते हैं-

यदक्षरैकसंसिद्धेः स्पर्धते ब्राह्मणोत्तमः ।।
हरिशंकरकंजोत्थ सूर्यचन्द्रहुताशनैः ॥ (गायत्री तन्त्र)

''जो सच्चा साधक गायत्री के एक अक्षर की भी सिद्ध कर लेता है, उसकी स्पर्धा हरि, शंकर ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि से होने लगती है ।''

ऐहिकायुष्मिकं सर्वं गायत्री जपतो भवेत् ।। (अग्नि पुरा) ‍

इहलोक और परलोक के समस्त इष्ट फलों की प्राप्ति गायत्री जप से होती है ।।

गायत्र्येव तपोयोगः साधनं ध्यान मुच्यन्ते ।।
सिद्धानां सामता माता नातः किंचित् वृहत्तरम् ॥ (स्कन्द पुराण)

गायत्री ही तप है ।। गायत्री ही योग है ।। गायत्री ही सबसे बड़ा ध्यान और साधन है ।। इससे बढ़कर सिद्धि दायक साधन और कोई नहीं है ।।

परांसिद्धिमवाप्नोति गायत्री मुत्तमां पठेत् ।। (शक्ति समुच्चय)

गायत्री का जप करने से परा सिद्ध प्राप्त होती है ।।

यतः साक्षात् सर्व देवतात्मनः सर्वात्म द्योतक, सर्वात्मा प्रतिपादकोऽयं गायत्री मंत्र ।। (कौडिन्य)

यह गायत्री मंत्र साक्षात् देव रूप, सर्व शक्तिमान, सबको प्रकाश देने वाला सर्वात्मा ज्ञान का प्रतिपादक है ।।

गायत्री को ब्राह्मी शक्ति कहा गया है ।। यह ब्रह्माण्डीय चेतना का वह भाग है जो मानवी सत्ता को समुन्नत, समृद्ध एवं समर्थ बनाने की दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है ।। गायत्री विद्या आत्मा और परमात्मा के बीच सम्भव हो सकने वाले आदान-प्रदानों के सन्दर्भ में अभीष्ट जानकारी प्रदान करती है ।। इसी गायत्री उपासना का प्रयोजन मानवी कलेवर के तीनों स्तर- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर को इस योग्य बनाना है कि उन पर दिव्य अवतरण हो सके, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही गायत्री को ब्राह्मी कहा गया है और ब्रह्मतत्त्व से उसकी एकता प्रतिपादित की गयी है ।। गायत्री और ब्रह्म की एकता के ऐसे अनेकों प्रतिपादन शास्त्रों में मिलते हैं ।। यथा-

ब्रह्म हि गायत्री ।। (ताण्डव 11/11/9)
ब्रह्म गायत्री ।। (जै.उ. 1/18)
ब्रह्म वै गायत्री (ऐत. 4/11को. 3/5)
ब्रह्म गायत्री ।। (शत 1/3/58)

अर्थात् निश्चित रूप से गायत्री ब्रह्म ही है ।।
देवी दात्री च मोक्त्री चे देवी सर्वमिदं जगत् ।।
देवी जयति सर्वत्र यो देवी साऽहमेवच॥
सर्वात्मना हि सा देवी सर्व भूतेषु संस्थिता ।।
गायत्री मोक्ष हेतुर्वे मोक्ष स्थान मलक्षणम् ॥ (ऋषि शृंग)

दिव्य, देने वाली, भोक्ता, सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त जिसकी सर्वत्र जय ही जय है ऐसी गायत्री परब्रह्म है ।। वही मोक्ष का आधार है, यही मोक्ष का स्थान है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार ब्रह्माजी ने गायत्री चार चरण की व्याख्या, चार वेदों के रूप में की है ।। इसका प्राकट्य आकाशवाणी के, ब्रह्म निर्देश के अन्तः प्रेरणा के रूप में हुआ माना जाता है ।। इस प्रक्रिया को जीव और ब्रह्मा के बीच आदान- प्रदान की शृंखला भी कह सकते हैं ।।

जीव ब्रह्म के बीच आदान- प्रदान की शृंखला रहने के कारण इस दिव्य- चेतना को ब्रह्म विद्या कहते हैं ।। उसके माध्यम से मनुष्य के अन्तःकरण में उच्चस्तरीय आस्था प्रवाह का संचार होता है जिसे ब्रह्मज्ञान, तत्त्वज्ञान आदि नाम दिये जाते हैं ।। व्यक्ति में गायत्री शक्ति के समावेश होने का परिचय इस सद्ज्ञान की अभिवृद्धि से ही मिलता है ।। जीवन की हर समस्या का समाधान और प्रगति के हर क्षेत्र का मार्गदर्शन इस महामंत्र में सन्निहित संकेतों के आधार पर किया जा सकता है ।। इसी से गायत्री को ब्रह्म विद्या कहा गया है

स ब्रह्म विद्यां सर्व विद्या प्रतिष्ठितम् ।। (मुण्डक)

सम्पूर्ण विद्याओं में ब्रह्म विद्या ही श्रेष्ठ है ।।
गायत्री सद्ज्ञान की गंगोत्री है ।। उसे अपनाने से अन्तःकरण में सद्ज्ञान का, ब्रह्मविद्या का अवतरण होता है ।। ऐसा ब्रह्मचेतना मनुष्य ब्राह्मण कहलाता है ।। ब्राह्मण अपने ब्रह्म तेज से स्व- पर कल्याण कर सकने में समर्थ होता है ।। उसकी ब्रह्म तेजस्विता का स्तर ब्रह्म तुल्य हो जाता है ।।

ब्रह्म ब्राह्मणे ब्रह्मविदि प्रतिष्ठितम् ।।
वह ब्रह्म ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण पर प्रतिष्ठित है ।।
यो ह वा एवं वित्त ब्रह्मवित् पुण्याचं कीर्ति लभते सुरभींश्च गंधान् ।।
 सोऽपहत् पाप्मानं श्रियमश्नुते य एवं वेद ।। यश्चैवं विद्वनेवमेतां वेदानां मातरं सावित्री सम्पदमुपनिषद मुपास्त इति ब्राह्मणम् ।। (गायत्री उपनिषद)

जो इस प्रकार जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मज्ञानी पुण्य- कीर्ति और सुरभि- गंध को प्राप्त करता है ।। उसके समस्त पाप दूर हो जाते हैं ।। वह अनन्त श्री ऐश्वर्य वैभव का उपभोग करता है ।। जो इस प्रकार जानता है और जो इस प्रकार ज्ञान सम्पादन करके समस्त वेदों की माता सावित्री के इस उत्तम सम्पत्ति उपनिषद् की उपासना करता है वही ब्राह्मण है ।।

परब्रह्म स्वरूपा च निर्वाण पद दायिनी ।।
ब्रह्मतेजोमयी शक्ति स्तधिष्ठात् देवता ॥
गायत्री परब्रह्म स्वरूप तथा निर्वाण पद देने वाली है ।। वह ब्रह्म तेज की अधिष्ठात्री देवी है ।।

परब्रह्म स्वरूपा च निर्गुण पद दायिनी ।। ब्रह्मतेजोमयी शक्ति स्तदधिष्ठातृ देवता ॥ (देवी भागवत् 9/1/42)
वह ब्रह्म स्वरूप निर्विकल्प पद देने वाली, ब्रह्म तेज यही परम शक्ति तथा अधिष्ठात्री देवी गायत्री ही है ।।

तस्मिस्तज्जने भेदा भावत् ।।
ब्रह्म विद् ब्रह्मैव भवति ॥
इस प्रकार सब भेद जाता रहता है ।। ब्रह्म का जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है ।।

सावित्र्याश्चैव मन्त्रार्थ ज्ञात्वा चैव यथार्थतः तस्यां ययुक्तं चोपास्यं ब्रह्म भूयाय कल्पते ।। (योगी याज्ञवल्क्य)
गायत्री का गूढ़ मर्म और रहस्य जानकर जो उसकी उपयुक्त उपासना करता है वह ब्रह्मभूत ही हो जाता है ।।

यश्चैवं विद्वानेव मेता वेदानां मातरं सावित्री सम्पदा मुपनिषद मुपास्ते इति ।। (गोपथ)
ब्राह्मण वेद माता गायत्री की उपासना करने वाले विद्वान और श्रद्धावान होते हैं ।।
ब्रह्मविद्या और ब्राह्मण दोनों अन्योऽन्याश्रित है ।।
ब्रह्मविद्या का सही अवगाहन करने वाला सच्चा ब्राह्मण बनकर रहता है ।। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि ब्राह्मण को ही ब्रह्म विद्या प्राप्त होती है ।। यहाँ जाति, वंश के आधार पर जाने वाले ब्राह्मण कुल की चर्चा नहीं हैं ।। ब्राह्मणत्व तो एक मनोभूमि है, जिसमें आत्म- परिष्कार और लोक मंगल के तत्व कूट- कूट कर भरे होते हैं ।। ऐसे ही ब्रह्म परायणों की अवधारणा से ब्रह्म विद्या यशस्विनी होती है ।। दोनों एक- दूसरे के सहयोग से धन्य बनते हैं ।।

उपनिषद् में वर्णित ब्रह्मविद्या और ब्राह्मण के बीच यह एक अलंकारिक संवाद इस तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट करता है ।। उस संवाद में बताया गया है कि ब्रह्म परायण, उदात्त दृष्टिकोण युक्त व्यक्ति ही ब्रह्म चर्चा करे तो उत्तम है ।वाचालता एवं छद्म उद्देश्यों के लिए उसे प्रयुक्त करने से तो न करना ही उपयुक्त है ।।

विद्या ब्राह्मण मेत्याह सेवधिस्तेऽसिप रक्षमाम् ।।
असूर्यकाय मां मातास्तथा स्यां वीर्यवित्तम्त् ॥
विद्या ब्राह्मण के समीप में आकर कहती है कि मैं तेरी धरोहर हूँ तुझे मेरी भली- भाँति रक्षा करनी चाहिए ।। मुझे किसी भी निन्दक पुरुष को मत देना ।। ऐसा तेरे करने पर मैं अधिक वीर्य- पराक्रम वाली जाऊँगी ।।

विद्या ह वै ब्राह्मण मा जगाम गोपाय मां शेवधि स्तेऽहमस्मि ।। असूया माया नृजवेऽयताय न मां ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् ॥
ब्रह्म विद्या ब्राह्मण के समीप में आकर उससे कहती है कि मेरी रक्षा करो, मैं तुम्हारी निधि हूँ ।। जो असूया (निन्दा) करने वाला हो, कुटिल हो और संयम से शून्य हो ऐसे पुरुष को मुझे कभी मत देना, तभी मैं वीर्य वाली होऊँगी ।।

ब्रह्म विद्या की उपहासास्पद स्थिति तब बनती है जब उसका अवगाहन करने वाले व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को आवश्यक न मानकर कर्मकाण्डों और विधि- विधानों को ही सब कुछ मान लेते हैं ।। अग्नि बिना ईंधन ज्वलनशील कहाँ होता है ।। ज्योति के अभाव तेल बत्ती युक्त दीपक भी कहाँ प्रकाश दे पाता है, उसी प्रकार व्यक्ति की निकृष्टता के रहते, उपासनात्मक कर्मकाण्ड भी कब सफल होते हैं ।। ब्राह्मण की दुर्दशा का, असफलता का एक मात्र कारण उसकी उत्कृष्टता का स्वर गया गुजरा होना ही है, साधना विधानों में अन्तर रहने की बात इस सन्दर्भ में कोई बड़ा व्यवधान प्रस्तुत नहीं करती ।। कहा भी है-

अध्यापन शीलं च सदाचार विलयनम् ।।
सालस चे दुरन्नादं ब्राह्मण वाधते यमः ॥
स्वाध्याय न करने से, आलस्य से और कुधान्य खाने से ब्राह्मण का पतन हो जाता है ।।

अनभ्यस्त वेननामा चारस्य च वर्जनात् ।।
आलस्यात् अन्न दोषाच्च् मृत्युर्विप्रान् जिथा सति ॥ (मनु.5/4)
वेदों का अभ्यास न करने से, आचार छोड़ देने से, आलस्य से, कुधान्य खाने से ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है ।।

जिह्वा दग्ध परान्नेव करौ दग्धौ प्रति ग्रहात् ।।
मनोदग्धं परस्त्रीभिः कथं सिद्धिवरानने ।।
वादार्थ पठयते विद्या, परार्थ क्रियते जपः ।।
ख्यात्यर्थ दीपते दानं कथं सिद्धिवरानने ।।

अर्थात् पराया अन्न खाने से जिह्वा की शक्ति नष्ट हो गयी ।। दान- दक्षिणा लेते रहने से हाथों की शक्ति चली गई, पर नारी की ओर मन डुलाने से मन नष्ट हो गया, फिर हे पार्वती इन ब्राह्मणों को सिद्धि कैसे प्राप्त हो सकती है ।।
ब्रह्म विद्या परायण, सदाचार निष्ठा, सच्चरित्र और परायण रहते हुए गायत्री उपासक साधना का आश्रय लेकर सब प्रकार धन्य बनता है ।। ऐसे व्यक्तियों का गुणानुवाद करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है-

एवं विच्छान्तोदान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितः भूत्वाऽत्मनोवात्मानं पश्यति ।।
 व्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मातरति सर्व पाप्मानं तरति नैन पाप्मानं तपति ।।
सर्व पाप्मानं तपतिविपापो रिजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवति ॥ (वृहद 4अ 4/23)

अर्थ- इस प्रकार से जानने वाला शान्त, उपरान्त तितिक्षु (और) समाहित होकर आत्मा में ही परमात्मा को देखता है, सब जीवों का जो अन्तरात्मा उसे देखता है ऐसे ब्रह्म परायण को पाप दबा नहीं सकता ।। वह समस्त पापों का उल्लंघन कर जाता है ।। उसे पाप तपाता नहीं ।। वह उल्टा पापों को तपाता है ।। पाप रहित, वासना रहित व्यक्ति निस्संदेह ब्राह्मण ही होता है ।।

हस्त त्राणप्रदा देवी, यततां नरकार्णवे ।।
तस्मात्ता मभ्य सेन्नित्यं, ब्राह्मणो नियताः शुचिः ॥
जो मनुष्य नर्क रूपी समुद्र में पड़े हैं, उनका हाथ पकड़ कर रक्षा करने वाली गायत्री ही है ।। इसलिए नियमपूर्वक पवित्रता से ब्राह्मण नित्य गायत्री का अभ्यास करे ।।

गायत्री जाप निरत, हव्य कत्थेप भोजयेत् ।।
तस्मिन् तिष्ठति पाप मव्विं दुखी पुष्कर ।।
जापे नैव तु सं सिद्धब्राह्मणो नात्र संशयः ॥
गायत्री में तत्पर ब्राह्मण को हव्य कव्य से जावे ।। क्योंकि उस ब्राह्मण में पाप इस भाँति नहीं टिकते जैसे कमल के पत्ते पर जल ।।
ब्राह्मण गायत्री जप करने से ही सिद्धि पाता है ।। इसमें कोई सन्देह नहीं है ।।

उपांशु रयाच्छत गुणः, सहस्रों मानसः स्मृतः ।।
नोच्यै जाप्यं बुधः कुर्यात् ।। सावित्र्यास्तु विशेषतः ।।
उपांग जप सौ गुना फल देने वाला है, मानस जप हजार गुना ।। विशेषकर गायत्री जप ऊँचे स्वर से न करें ।।

सावित्री जाप्य निरतः स्वर्ग माप्नोपित मानवः ।गायत्री जाप्य निरतो, मोक्षो पापं च च विदति ॥
जो मनुष्य गायत्री के जप में तत्पर है वह स्वर्ग पाता है और गायत्री जप करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।।

स्मार्त सर्व प्रयत्नेन, स्रातः प्रपत्र मानसः ।।
गायत्री तु जपेद्भता सर्व पाप प्रणाशिनीम् ।।

इस कारण प्रयत्न पूर्वक स्नान कर, पवित्रता पूर्वक स्वस्थ चित्त हो, पाप नाशक एवं वरदात्री, वेदमाता गायत्री का निरन्तर जप करे ।।

(गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन पृ.सं.8.105)

जिह्वा दग्धा परान्नेव करौ दग्धौ प्रति ग्रहात् ।।
मनोदग्धं परस्त्रीभिः कथं सिद्धिर्वरानने ।।
वादार्थ पठयते विद्या, परार्थं क्रियते जपः ।।
ख्यात्यर्थ दीपते दानं कथं सिद्धिर्वरानने ।।

अर्थात् पराया अन्न खाने से जिह्वा की शक्ति नष्ट हो गयी ।। दान- दक्षिणा लेते रहने से हाथों की शक्ति चली गई, पर नारी की ओर मन डुलाने से मन नष्ट हो गया, फिर हे पार्वती इन ब्राह्मणों को सिद्धि कैसे प्राप्त हो सकती है ।।
ब्रह्म विद्या परायण, सदाचार निष्ठा, सच्चरित्र और परायण रहते हुए गायत्री उपासक साधना का आश्रय लेकर सब प्रकार धन्य बनता है ।। ऐसे व्यक्तियों का गुणानुवाद करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है-

एवं विच्छान्तोदान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽत्मनोवात्मानं पश्यति ।। र्सव्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मातरति र्सव्व पाप्मानं तरति नैन पाप्मा तपति ।।
र्सव्व पाप्मान तपतिविपापो रिजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवति॥ (वृहदा. 4अ 4/23)

अर्थ- इस प्रकार से जानने वाला शान्त, उपरान्त तितिक्षा (और) समाहित होकर आत्मा में ही परमात्मा को देखता है, सब जीवों का जो अन्तरात्मा उसे देखता है ऐसे ब्रह्म परायण को पाप दबा नहीं सकता ।। वह समस्त पापों का उल्लंघन कर जाता है ।। उसे पाप तपाता नहीं ।। वह उल्टा पापों को तपाता है ।। पाप रहित, वासना रहित व्यक्ति निस्संदेह ब्राह्मण ही होता है ।।

हस्त त्राणप्रदा देवी, पततां नरकार्णवे ।।
तस्मात्ता मभ्य सेन्नित्यं, ब्राह्मणो नियतः शुचिः॥
जो मनुष्य नर्क रूपी समुद्र में पड़े हैं, उनका हाथ पकड़ कर रक्षा करने वाली गायत्री ही है ।। इसलिए नियमपूर्वक पवित्रता से ब्राह्मण नित्य गायत्री का अभ्यास करे ।।

गायत्री जाप निरत, हव्य कत्थेप भोजयेत ।।
तस्मिन्न तिष्ठते पाप मव्विं दुखि पुष्केर ।।
जापे नैव तु सं सिद्धब्राह्मणो नात्र संशयः॥
गायत्री में तत्पर ब्राह्मण को हव्य कव्य से जिमावे ।। क्योंकि उस ब्राह्मण में पाप इस भाँति नहीं टिकते जैसे कमल के पत्ते पर जल ।।
ब्राह्मण गायत्री जप करने से ही सिद्धि पाता है ।। इसमें कोई सन्देह नहीं है ।।

उपांशु रयाच्छत गुणः, सहस्रो मानसः स्मृतः ।।
नोच्यै जाप्यं बुधः कुर्यात् ।। सावित्र्यास्तु विशेषतः ।।
उपांशु जप सौ गुना फल देने वाला है, मानस जप हजार गुना ।। विशेषकर गायत्री जप ऊँचे स्वर से न करें ।।

सावित्री जाप्य निरतः स्वर्ग माप्नोपित मानवः ।गायत्री जाप्य निरतो, मोक्षो पापं  च वदति ॥
जो मनुष्य गायत्री के जप में तत्पर है वह स्वर्ग पाता है और गायत्री जप करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।।

स्मात् सर्व प्रयत्नेन, स्रातः प्रपत मानसः ।।
गायत्री तु जपेद्भता सर्व पाप प्रणाशिनीम् ।।

इस कारण प्रयत्न पूर्वक स्नान कर, पवित्रता पूर्वक स्वस्थ चित्त हो, पाप नाशक एवं वरदात्री, वेदमाता गायत्री का निरन्तर जप करे ।।

(गायत्री महाविद्या का तत्वदर्शन पृ.सं.8.105)





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