सृजन का प्रेरक प्रवाह

June 1998

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शान्तिकुञ्ज की दृश्य गतिविधियाँ अदृश्य से उफन रहे सृजन के प्रेरक प्रवाह की देन है। देवात्मा हिमालय के दिव्यक्षेत्र से उमड़ने वाला यह प्रवाह ही यहाँ के विभिन्न क्रिया–कलापों के रूप में मूर्त होकर अपना विस्तार करता है। इसे परमपूज्य गुरुदेव की भागीरथी तप-साधना के प्रभाव से हुआ गंगावतरण कह सकते हैं। अपनी प्रचण्ड तप-साधना एवं महान ऋषिसत्ताओं के कृपाप्रसाद से ही वे शान्तिकुञ्ज को इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री का रूप देने में समर्थ हुए। सूक्ष्मवेत्ता एवं दिव्यदर्शी हिमालय के इस दिव्यप्रवाह को यहाँ के व्यापक परिसर में सहज की उफनते-उमड़ते आन्दोलित-आलोड़ित होते हुए अनुभव कर सकते हैं। हिमालय की चेतनधाराएँ स्वाभाविक क्रम में यहाँ रहने वाले एवं आने वालों को पवित्रता, प्रखरता एवं तेजस्विता के अनुदान बाँटती रहती है।

अतीत के पुनरागमन-वर्तमान के निर्धारण और भविष्य के संयोजन के त्रिविध उद्देश्य पूरे कर सकने में यह नवसृजन का प्रेरक प्रवाह पूरी तरह से समर्थ है। परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माताजी की सम्मिलित तपशक्ति जन-जन को इससे अनुप्राणित-प्रेरित एवं प्रभावित कर रहीं है। अनुदिन नवीन विस्तार इसकी तीव्रता एवं प्रखरता का ही परिणाम है। इसी के फलस्वरूप नितनयी योजनाएँ बनती और असाधारण क्रम में अपना विस्तार करती हैं। विस्तार के इसी क्रम में शान्तिकुञ्ज से ढाई गुना बड़ा स्थान उपलब्ध हो गया है। इसकी विधिवत् रजिस्ट्री आदि सम्पन्न होकर महाशिवरात्रि की पावन वेला में वरुण देवता के अभिसिंचन के मध्य भूमिपूजन-भगवान महाकाल का पूजन भी सम्पन्न हो चुका है। प्रायः 11 लाख वर्ग फुट (131 बीघा) में फैली यह भूमि हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग से सटी हुई वर्तमान शान्तिकुञ्ज से मात्र दो फर्लांग की दूरी पर है।

भारतीय संस्कृति के खुले विश्वविद्यालय का नवसृजन यहाँ होने को है, जिसके माध्यम से देवसंस्कृति के विविध आयाम प्रकट होकर अपनी दिव्यता से समूचे विश्व को चमत्कृत कर देंगे। यूँ वर्तमान क्षणों तक यह योजना अभी कल्पना के गर्भ में है। इन क्षणों में उनके द्वारा उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया और सम्भावना का सुखद अनुमान ही लगाया जा सकता है। पर निकट भविष्य में जब वह मूर्त रूप में सामने होगी तो प्रतीत होगा कि मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के संदर्भ में जो सोचा, कहा और किया जा रहा था, वह अनर्गल नहीं था,

नवसृजन के प्रेरक प्रवाह से ही यह प्राणवान संकल्प उभरा है, और यह सर्वविदित है कि प्राणवान संकल्प साधनहीन परिस्थितियों में भी किस प्रकार उगते-बढ़ते और फलते-फूलते हैं। इसके अनेक उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हैं। इस श्रृंखला में नवयुग के अवतरण को लक्ष्य रखकर किए गए इन प्रयासों को अपने समय का दुस्साहस ही कहा जाएगा। प्रचण्ड संकल्पों की सामर्थ्य जिन्हें विदित है, वे जानते हैं कि मनुष्य को भगवान की निकटतम प्रतिकृति ही कहा जा सकता है। जब वह ईश्वरीय उद्देश्य को लेकर अपनी समस्त आस्था को नियोजित करके कर्मक्षेत्र में उतरता है, तो सचमुच ही असम्भव जैसी कोई वस्तु रह नहीं जाती।

ग्वाल-बालों की कमजोर कलाइयाँ और पोले बाँस की लाठियाँ महाशैल गोवर्धन उठा सकती थी, इस पर कौन-किस आधार पर विश्वास करें? इतने पर भी अनहोनी होकर रही, गोवर्धन उठ ही गया। नवसृजन का संकल्प महाकाल का है। उसी के प्राण इस महाअभियान में संलग्न हैं, जब मनुष्यों के प्राणवान संकल्प पूरे हो सकते हैं तो सृष्टि संतुलन का उत्तरदायित्व सँभालने वाली शक्ति की इच्छा क्यों न पूरी होगी?

इक्कीसवीं सदी के अगले दिन सुखद सम्भावनाओं से भरे पड़े हैं। दिव्यदर्शी बहुत समय से इस प्रभात के आगमन की सूचना दे रहे थे। अब ब्रह्ममुहूर्त की उदीयमान ऊषा ने सुनिश्चित आश्वासन दिया है कि अरुणोदय सन्निकट है। उसके लिए अब अधिक समय प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। इन दिनों उभरते उग्र विग्रहों को सूक्ष्मदर्शी प्रसवपीड़ा मानते हैं और कहते हैं-अधीर होने के आवश्यकता नहीं है। महान उद्भव के दर्शन अब होने ही वाले हैं।

इस प्रभातवेला में नवसृजन का प्रेरक प्रवाह तीव्र गति से उफनता-उमड़ता चला आ रहा है। इसकी प्रत्येक हलचल एवं हर स्पन्दन से यही स्वर उठ रहे हैं कि युग सृजन के लिए जाग्रत आत्माओं को अपने भावभरे अनुदान प्रस्तुत करने ही चाहिए। सृजन प्रयोजनों में प्रस्तुत भारतीय-संस्कृति के खुले विश्वविद्यालय का निर्माण इमारत की दृष्टि से कम और लक्ष्यपूर्ति की दृष्टि से अधिक महत्व का है। इसके अंतर्गत आयुर्वेद की शोध, विद्या-विस्तार के अभूतपूर्व कार्यक्रमों के साथ जो प्रखर साधकों एवं समर्पित परिव्राजकों के निर्माण की जो योजना सँजोयी है वह अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता उन आत्माओं के योगदान की है जो स्वयं जाग चुके और दूसरों को जगा सकने की स्थिति तक जा पहुँचे हैं, क्योंकि ऐसे ही लोग महाकाल की इस अश्रुतपूर्ण योजना के लिए अपने समय, श्रम एवं धन के भावभरे अनुदान प्रस्तुत कर सकते हैं। साथ ही औरों को भी इसके लिए प्रेरित कर सकते हैं।

इस देश के निवासियों में महानता अभी भी कम नहीं है। ऋषियों के रक्त की पूँजी अभी भी पूर्णतया समाप्त नहीं हुई है। वह सब केवल सो भर गया है। मोहनिद्रा इतनी गाढ़ी हो गयी है कि नरपशुओं की तो बात ही क्या, जिनमें नर-नारायण की क्षमता भरी पड़ी है, वे भी लोभ और मोह की जंजीरों से इस बुरी तरह फँस गए है कि परमार्थ की युगसृजन की ईश्वरीय पुकार तक को समझ सकना भी उनके लिए सम्भव नहीं हो रहा है। जैसे-तैसे धक्का-मुक्की करने भर से थोड़ा-बहुत कुसमुसाते हैं और जैसे ही दबाव कम हुआ कि पूर्व स्थिति में फिर मूर्छाग्रस्त हो जाते है, जबकि युग परिवर्तन के लिए उत्कृष्ट प्रतिभाओं की प्रचण्ड जनशक्ति नियोजित होनी चाहिए। वर्तमान कार्ययोजना इसी महान उद्देश्य के लिए है। इसके द्वारा जिन रचनात्मक प्रवृत्तियों का सूत्र-संचालन होने वाला है, उसे ‘धर्मचेतना के पुनर्जीवन का देवप्रयास’ कहा जा सकता है। इसके माध्यम से प्रवाहित होने वाली नवसृजन की धाराएँ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिधि में साँस्कृतिक जागरण के अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करेंगी। हमें ऐसी ही आशा करनी चाहिए।


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