विचारधारा का प्रगतिशील परिष्कार

May 1990

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छोटे बच्चे भूत पलीतों की परियों की पशु-पक्षियों की कथा गाथाएँ चावपूर्वक सुनते हैं। कल्पनालोक में विचरण उन्हें बहुत सुहाता है। अनगढ़ विचारप्रवाह के साथ उड़ने वाले पत्तों, तिनकों एवं रेतकणों की तरह उछाल भरते रहते हैं। अनियंत्रित विचार जिन पर स्वच्छंद कल्पनाएँ सवार रहती है, मस्तिष्क को व्यस्त तो बनाये रहते हैं पर उनसे किसी प्रयोजन की पूर्ति नहीं होती।

शेखचिल्ली की कहानी प्रसिद्ध है। उसने कल्पना के स्वेच्छाचारी घोड़े पर सवार होकर ऐसी मनगढ़ंत गढ़नी शुरू कर दी थी जो न व्यावहारिक थी न संभव। अन्त में घाटा भी उठाना पड़ा और तिरस्कार भी सहना पड़ा। इतने पर भी देर तक उसका मन तो रंगीले दिवास्वप्नों में डूबे रहने का मनोविनोद मात्र ही तो करता रहा। कितने ही व्यक्ति भावावेश की अधिकता और व्यावहारिक अनुभव की कमी के कारण कई प्रकार की कल्पनाएँ-जल्पनाएँ करते रहते हैं पर समयक्षेप के अतिरिक्त पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता। असफलताओं की खोज और संपर्क वालों का उपहास तिरस्कार ही उनके ऊपर लदता है।

एक और प्रकार की मानसिकता होती है जिसमें शारीरिक आलस और मानसिक प्रमाद ही प्रेरणा स्रोत होता है। वे झंझटों से बचना चाहते हैं। जो है उसी में संतुष्ट रहते हैं और ऐसा कुछ नहीं सोचते जिसमें परिवर्तन की बात उठती हो, कुछ नया सोचने कुछ नया करने की आवश्यकता पड़ती हो। किसी तरह दिन, गुजारना, काम चलाना ही उन्हें पर्याप्त लगता है। ऐसे लोगों की नर पामरों की बहुलता सर्वत्र देखी जाती है अन्यथा गई गुजरी स्थिति में जीने वाले लोग अपने उत्कर्ष अभ्युदय की बात सोचते और संकल्प उभारते हुए, योजना बनाते हुए परिपक्व पुरुषार्थ के सहारे कुछ न कुछ कर गुजर और अनगढ़ स्थिति से उबर कर कहीं से कहीं जा पहुँचते। लंबे समय से पिछड़ी हुई परिस्थितियों में पड़े रहने का एक ही कारण है परिवर्तन के लिए उत्साह न उभरना। प्रयासों में उत्कर्ष व पक्षधर प्रेरणाओं का समावेश न होना। यदि ऐसा न रहा होता तो कोई कारण नहीं कि संसार का अकाट्य नियम ‘अग्रगमन’ इस प्रकार कुंठित होकर न पड़ा रहता।

विचार एक प्रकार की हलचल है। शरीर के भीतरी सभी अंग अवयव निरन्तर गतिशील रह हैं। बाहर से भी इन्द्रियों की कुछ न कुछ क्रिया होती ही रहती है। मनः संस्थान की भी अपने हलचलें हैं जो विचारों के रूप में जानी जाती है। यह सार्थक भी हो सकते हैं और निरर्थक भी। उनके पीछे योजनाएँ भी रह सकती है और बेतुकी हरकतें हलचलें भी। कई बार उपयोग सृजनात्मक विचार भी उठ सकते हैं और कई बार पतनोन्मुख ऐसे भी, जो अपने और दूसरों के लिए मात्र अनर्थ हो प्रस्तुत करें। ऐसे दोनों ही प्रकार के विचार सशक्त स्तर के होते हैं। इसलिए उनकी प्रेरणा शक्ति के नाम से जानी जाती है। किसी दिशा में प्रगति भी उसी आधार पर होती और भले बुरे स्तर की प्रतिभा के निखरने के आधार भी उसी के सहारे बढ़ता, परिपक्व होता है अन्तिम निर्णय अपनी बुद्धिमत्ता पर निर्भर रह है। यदि वह कुण्ठाग्रस्त हुई तो उस मार्ग को अपनाती है जिसमें तत्काल अधिक लाभ मिलने की संभावना प्रतीत होती है। भले ही कुछ समय उपरान्त उसके भयानक दुष्परिणाम सामने आवें अनाचारी, अतिवादी, अपराधी, दुर्व्यसनी इसी में को अपनाते हैं। तात्कालिक लाभ उसकी बुद्धी का समर्थन ही करता है पर यह नहीं समझता है कि अनैतिक उपायों को अपनाकर सफलता हस्तगत की जाती है। वह कुछ समय के उपरान्त व्यक्तित्व की प्रामाणिकता समाप्त कर देती है और भविष्य की सुखद संभावनाओं का द्वार स्थायी रूप से बंद कर देती है। ‘जाल में फंसने वाली चिड़ियाँ, मछलियाँ ऐसे ही अदूरदर्शी लालच के फेर में पकड़कर बहेलियों के हाथ पड़ती और अपना सर्वनाश करती हैं। यह विचारों की अधोगामिता का ही प्रतिफल है। कितने ही प्राकथित समझदार सुशिक्षित भी इसी मार्ग पर चल पड़ते हैं। उन्हें नीतिमत्ता की दिशा और उसे अपनाने पर उपलब्ध होने वाली सुखद संभावना का ज्ञान नहीं होता। इस विडम्बना को ‘समझदारों की नासमझी’ ही कह सकते हैं। फुलझड़ी घुमाकर हाथ हिला लेने वाले प्रायः इसी स्तर के अदूरदर्शी होते हैं।

प्रतिभा के पीछे आस्थाएँ और मान्यताएँ काम करती है। किसी भले बुरे तथ्य पर सघन विश्वास जमा लेना एक संकल्प शक्ति का प्रवाह उत्पन्न करता है। तस्कर, लुटेरे, ठग, आततायी प्रायः इसी प्रकार की निकृष्ट स्तर की प्रतिभा से सम्पन्न होते हैं। दुस्साहस भी उनका बढ़ा होता है। यदि इसका अभाव रहता है तो वे आगा पीछा सोचते और करने न करने की उधेड़बुन में फंसे रहते। साहसिक पुरुषार्थ करने की क्षमता जिस आधार पर उत्पन्न होती है, उसे भी प्रतिभा कहते हैं, भले ही वह अनैतिक या अनर्थ मूलक ही क्यों न हो?

प्रतिभा का उज्ज्वल पक्ष वह है जिसमें व्यक्ति मानवी गरिमा के स्तर को अक्षुण्ण बनाये रहने को सर्वोपरि महत्व देता है। आदर्श अपनाने पर श्रेष्ठ, वरिष्ठ बनने की उमंगें आती रहती है। वैसा ही कुछ कर गुजरने की योजना बनती हैं और उस राह पर चल पड़ने की तैयारी होने लगती है। उनके सामने ऐसे लोगों के जीवनचरित्र एवं संस्मरण सामने रहते हैं, जिन्होंने उत्कृष्टता के पक्षधर विचारों को अपनाया। उन्होंने अपने स्तर को बढ़ाने और प्रगति पथ पर चल पड़ने का राजमार्ग पाया।

आमतौर से अपने स्वास्थ्य धन और क्षमता संवर्धन के क्षेत्रों पर ध्यान रखा जाता है। कहीं कोई छेद तो नहीं उभर रहा है। समर्थता का अपव्यय तो नहीं हो रहा है इसके लिए अपनी-अपनी मनःस्थिति के अनुरूप सभी ध्यान रखते हैं। प्रत्यक्ष को बनाने और बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता है पर यह भुला दिया जाता है कि समय एवं चिन्तन जैसी सर्वोपरि सम्पदा का सही नियोजन हो रहा है या नहीं। इन दोनों का अपव्यय उससे कहीं अधिक घातक है जितना कि वैभव को क्षति पहुँचने पर होता है। इन दोनों में भी विचारों के सदुपयोग दुरुपयोग का महत्व सर्वोपरि है। यदि चिन्तन प्रवाह गड़बड़ाने लगे तो स्थिति अर्धविक्षिप्त जैसी बन जाती है। अनगढ़ स्थिति में लोग मात्र इसी एक कारण में पड़े रहते हैं कि उन्हें प्रगति पथ पर चलने की आकांक्षा जगा सकने का अवसर नहीं मिलता। वे यह नहीं सोचते कि अब की अपेक्षा भविष्य में अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए विचारों में क्या परिवर्तन करना चाहिए और तद्नुरूप अवसर ढूँढ़ने के लिए क्रिया–कलापों को किस दिशा में मोड़ना, मरोड़ना धकेलना चाहिए?

बीज आधारभूत कारण है, वृक्ष उसका प्रगति परिणाम। विचारों की प्रगतिशीलता, उमंग भरी साहसिकता उस बीज के समान है जो मनुष्य में उमंग उभारती, उकसाती और ऐसा कुछ करने के लिए बाधित करती है जो अब की अपेक्षा भविष्य को अधिक सुन्दर, समुन्नत, व्यवस्थित एवं अग्रगामी बना सके। इस तथ्य को समझ लेना और आधार को अपना लेना उन्नतिशील भविष्य के निर्माण का सुनिश्चित मार्ग है।


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