युगसंधि का मध्यांतर— उसकी रूपरेखा

February 1990

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प्रस्तुत जनसमुदाय में से अधिकांश की मान्यताओं, आकांक्षाओं, आदतों एवं प्रवृत्तियों में अवांछनीयता का असाधारण समन्वय हो चला है। उनकी योग्यता एवं क्षमता ऐसे प्रयोजनों में नियोजित रह रही है, जिसके कारण दुष्प्रवृत्तियों को ही बल मिले। उस समस्या से निपटा या निपटाया जाना है जो व्यवसाय, क्रियाकलाप, वैयक्तिक या सामूहिक रूप में छोटे या बड़े आकारों में बन पड़ रहे हैं, उनके प्रभाव-परिणाम भी अंततः अहितकर ही सिद्ध होते जा रहे हैं। जिनके दुष्परिणाम अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं, वे अवसर की प्रतीक्षा में हैं और अनुरूप अवसर पाते ही और भी भयावह अनर्थ कर गुजरने की तैयारी में हैं। इस विषमवेला में दो मोर्चों पर दोनों हाथों से आगे-पीछे की दोनों दिशाओं में जूझना आवश्यक हो गया है। असमंजस एक ही बात का है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे? दृश्यमान जनसाधारण में जब अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को जुटाना, समस्याओं का हल खोजना और विपत्तियों से उबरना तक संभव नहीं हो पा रहा है, तो यह आशा किन से, किस आधार पर की जाए कि वे इस आड़े समय में, दिव्य प्रयोजनों में, सहायता कर सकने में कुछ कहने लायक योगदान दे सकेंगे। ऐसी प्रतिभाएँ यदि जुट नहीं सकीं तो यही मानना पड़ेगा कि उज्ज्वल भविष्य की संभावना भले ही निश्चित हो; पर उसका आगमन-अवतरण काफी दूर है। उस अवसर की प्रतीक्षा में इतना समय लग सकता है कि अनर्थ हो चुके और निराशा आ घेरे।

समय की इस महती माँग को पूरा करने के लिए परोक्ष सत्ता ने इन दिनों कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनमें पहला है— अदृश्य वातावरण में भरे भौतिक एवं चेतनात्मक प्रदूषणों से निपटना। इसके लिए अध्यात्म स्तर का एक अतीव व्यापक युगसंधि पुरश्चरण आरंभ किया गया है। इसके आरंभिक दिनों में तो कुछ लाख ही भागीदार बने हैं, पर विश्वास किया गया है कि इस सामूहिक साधना में अगले ही दिनों करोड़ों सम्मिलित होंगे। एक ही प्रयोजन के लिए— एक ही सूत्र में संबद्ध होकर, एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है तो उसके बिखराव वाली अस्त-व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है। देवताओं की बिखरी शक्तियों को एक केंद्र पर केंद्रित करके, कभी प्रजापति ने ऐसी समर्थ महाकाली का सृजन किया था, जो देखते-देखते उद्दंड असुरता को धराशाई बनाने और देवसत्ता को उनकी गरिमा यथावत लौटाने में समर्थ हुई थी। प्रस्तुत युगसंधि पुरश्चरण को उसी स्तर का एक सामयिक प्रयोग समझा जा सकता है। यह साधना शान्तिकुञ्ज की इमारत तक सीमित नहीं है, वरन उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारों द्वारा संपन्न हो रहा है, जो अपने-अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ संपन्न कर रहे हैं। अदृश्य वातावरण में, सूक्ष्मजगत में छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की संभावना है। जहाँ भौतिक पुरुषार्थ अपर्याप्त पड़ता है, वहाँ दैवी सहायता का अवतरण ऐसे ही प्रयोगों द्वारा संपन्न होता है। तप-साधना की अपनी महती शक्ति ऐसे ही महान प्रयोजनों के लिए संपन्न की जाती रही है।

समय की दूसरी माँग है— ऐसी प्रतिभाओं का निर्माण, प्रशिक्षण और सृजन-क्षेत्र में उतारने का उपक्रम। इस सामुदायिक दिव्यशक्ति संकलन के बिना इतनी बोझिल गाड़ी किस प्रकार आगे बढ़ सकेगी, जिस पर कि मनुष्य जाति के भविष्य का भला-बुरा निर्धारण पूरी तरह लदा हुआ है? खींचने वाले इंजन, उठाने वाली क्रेनें, उछालने वाले राॅकेट उन दिनों विशेष रूप से आवश्यक होते हैं, जब गिरे को उठाने की आवश्यकता अनिवार्य बनकर अड़ जाती है। महाकाल का यह दूसरा संकल्प है कि युगसंधि की शेष अवधि में एक लाख सृजनशिल्पियों की प्रतिभाशाली संगठन-शक्ति को पंक्तिबद्ध खड़ी करके, सुनियोजित क्रियाकलापों में जुटाया जाए। विचारक्रांति उसका प्रथम पड़ाव है। ऑपरेशन के बाद भी चिकित्सकों के लिए बहुत कुछ करना शेष रह जाता है। विचारक्रांति एक निषेधात्मक पक्ष है। उसका दूसरा पक्ष सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन भी तो है। आग बुझा देना ही काफी नहीं। उजड़े हुए गाँव को फिर सुसंपन्न बनाना, उससे भी बड़ा काम है। दुष्प्रवृत्तियों के परिपोषण में पिछले दिनों असीम साधन लगे और विशालकाय तंत्र खड़े किए गए हैं। इन्हें निरस्त करना ही पर्याप्त न होगा; वरन आवश्यकता यह भी पड़ेगी कि श्रेष्ठता के पक्षधर, न केवल आचरण अपनाए जाएँ, वरन तदनुरूप विशाल सरंजाम जुटाए जाएँ, जो विनाश में प्रयुक्त होने वाले साधनों-उपकरणों की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल या समर्थ हों।

युगसंधि की बेला में इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण हेतु भागीरथी साधना में निरत शान्तिकुञ्ज की एक तीसरी प्रतिज्ञा और है कि निर्धारित अवधि में वह एक लाख वरिष्ठों के एक करोड़ तक के सहयोगी बनाकर रहेगी। दस वर्ष में इतनी प्रगति हो चुकना असंभव नहीं है। पचास लाख का वर्तमान परिवार यदि वर्तमान जनसंख्या अभिवृद्धि की गति अपना सके तो उसका चार गुना हो जाना किसी भी प्रकार असंभव नहीं माना जा सकता। खरगोश-चूहे तो इतनी अवधि में सौ गुने से भी अधिक हो सकते हैं। हमें यह आशा करनी चाहिए कि एक से पाँच, पाँच से पच्चीस बनने के जिस सिद्धांत का इन दिनों परिवार के हर क्षेत्र में कार्यान्वयन किया जा रहा है, उसकी गति यह पूरा वेग न पकड़ सके तो भी प्रज्ञा परिजनों को सन् 2000 तक एक करोड़ तो हो ही जाना चाहिए।

प्रश्न एक ही रह जाता है कि ऐसे प्रतिभाशाली देवमानव कहाँ से आएँ? उन्हें कहाँ पाएँ? उत्तर कस्तूरी मृग की तरह अपने भीतर ही ढूँढ़ना पड़ता है। उच्चस्तरीय क्रियाकलाप सदा अपने से, अपनों से ही आरंभ किए जाते रहे हैं। इस प्रसंग में भी वही होना है। शान्तिकुञ्ज परिवार पिछले दिनों पच्चीस लाख की गणना की परिधि छूता रहा है। अगले दिनों उसका कई गुना विस्तार होना संभाव्य है। इस सुविस्तृत समुदाय में से एक लाख प्रतिभाओं को खोज निकालना अथवा उन्हें नए सिरे से ढालना, गढ़ना, खरादना इतना बड़ा संकल्प नहीं है, जिसे असंभव माना या समझा जा सके। पिछले दिनों की प्रगति पर दृष्टिपात करने से यह विश्वास सहज ही सुदृढ़ हो जाता है कि अगले दिनों के निर्धारण असफल रहें, इसका कोई कारण नहीं। पिछले ही दिनों हर राजपूत परिवार से एक सैनिक, प्रत्येक ब्राह्मण परिवार से एक संत, प्रत्येक सिख परिवार से एक समर्पित निकलता रहा है तो वर्तमान परिजनों की तुलना में अगले ही दिनों कई गुने बढ़ जाने वाले परिवार से एक लाख सृजनशिल्पी और उनके एक करोड़ सहयोगी निकल न सकेंगे, ऐसी आशंका करने का कोई कारण नहीं।

इन पंक्तियों में सचेतन सत्ता वाले व्यक्तियों के उभरने को ही प्रमुख मानकर चला गया है। इनको जिन प्रयोजनों में लगना है, जिन साधनों का प्रयोग करना है, उसके संबंध में कोई संकेत नहीं दिया गया है। कारण कि भौतिक प्रयोजनों के लिए ही भौतिक साधन जुटाने को अनिवार्य माना और तारतम्य बिठाना पड़ता है; पर चेतना का चुंबकत्व तो स्वयं इतना प्रचंड है कि साधन, सहयोग के लिए अनुकूल अवसर तक स्वयं अविचल चल सके। महाकाल की शक्ति चेतन-सत्ता का समुच्चय जुट जाने पर स्वयं ही साधनों को भी बटोर लेती है। युगसंधि का मध्यांतर परोक्ष जगत से यही संदेश लेकर आया है व सारी दिशाओं, गगन को निनादित-गुंजित कर रहा है।


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