प्रेय के साथ श्रेय भी जुड़ा है

October 1979

Read Scan Version
<<   |   <   | |   >   |   >>

कठोपनिषद् में एक उपाख्यान आता है। आत्मज्ञान की इच्छा से अभिप्रेरित होकर नचिकेता यमराज के पास पहुँचा! यमराज ने उसे सम्पत्ति, श्री ऐश्वर्य जैसे अनेकों प्रलोभन दिये तथा कहा कि वह चाहे तो इन सबका उपभोग कर सकता है। उसे वे सारी वस्तुएँ दी जायेंगी जिसे साँसारिक सुख कहते है। नचिकेता उन प्रलोभनों से अप्रभावित रहा। उसने यमराज से प्रश्न किया देव! क्या ये वस्तुएँ हमको शाश्वत आनन्द की अनुभूमि कराने में सहयोग देगीं। यमराज ने उत्तर दिया, नहीं।

तब नचिकेता ने कहा, ‘श्रेष्ठ फिर इन नश्वर वस्तुओं को लेकर मैं क्या करूंगा मुझे तो श्रेय मार्ग को बताइये जिसका अवलम्बन लेकर आत्म-ज्ञान को प्राप्त कर सकूँ।’ यमराज ने नचिकेता के निर्लिप्त भाव को जानकर आत्म-ज्ञान का उपदेश दिया।

जीवन में दो प्रकार की परिस्थितियाँ प्रस्तुत होती हैं-एक श्रेय दूसरा प्रेय। प्रेय आकर्षणों का केन्द्र बिन्दु है। उस पर चलने वाला इन्द्रियजन्य सुखों में अपनी जीवन सम्पदा झोंकता रहता है। जबकि श्रेय मार्ग आन्तरिक सन्तोष शान्ति प्रदान करने वाला है। यहाँ बात दोनों के मतभेद की नहीं, बल्कि उनके स्तर की कही जा रही है। प्रेय, श्रेय साधन बनें यह तो बात समझ में आती है, किन्तु यदि आन्तरिक शान्ति, सन्तोष गँवाकर भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त की जा रही है तो वे अन्ततः दुःखदायी ही सिद्ध होंगी।

शास्त्रों में भौतिक प्रलोभनों, आकर्षणों से दूर रहने की बात कही गयी है। इन प्रतिपादनों का उद्देश्य भौतिक पदार्थों को बिल्कुल ही छोड़ देने से नहीं है बल्कि यह है कि उनके प्रति आसक्त न रहा जाय। भौतिक शरीर जब तक है तब तक भौतिक साधनों का परित्याग कर सकना सम्भव भी नहीं है। अन्न, जल, वायु, कपड़ा की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता है। ये सब श्रेय की प्राप्ति में सहयोगी हैं बाधक नहीं। किन्तु यदि भौतिक उपलब्धियों को ही लक्ष्य बना लिया गया तो भारी भूल होगी।

पाश्चात्य जगत का उदाहरण सामने है। भौतिक समृद्धियों में बढ़ा-चढ़ा तथा नवीन अनुसन्धानों का केन्द्र बिन्दु अमेरिका माना जाता है। सुख-साधनों की जितनी बहुलता वहाँ है, समस्याएँ भी वहाँ उसी अनुपात में बढ़ती जा रही है। व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में जितनी अशान्ति वहाँ दिखायी देती है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं है। कारणों की तह में जाने पर पता लगता है कि ‘प्रेय’ को ही लक्ष्य माना गया। साधन जीवन के साध्य बन बैठे। भौतिक पदार्थ चेतना पर हावी हो गया। आन्तरिक शान्ति संतोष के मूल्य पर भौतिक समृद्धि खरीदी गई।

अमेरिका की स्थिति का वर्णन करते हुए समाज शास्त्र के विशेषज्ञ इंग्लैण्ड निवासी श्री विल्फ्रेड वेलाव अपनी पुस्तक में लिखते हैं-

“पिछले दशक में जितनी भौतिक प्रगति हुई है अशान्ति भी उसी अनुपात में बढ़ी है! भौतिक समृद्धि की दृष्टि से अमेरिका सभी राष्ट्रों से आगे है। किन्तु इतना अशांत जीवन भी अन्यत्र कहीं नहीं है जितना कि अमेरिका में। इस अशान्ति का सर्वाधिक कारण समृद्धि का मोह और उपभोग की आतुर लालसा है।”

शास्त्रकारों ने इस कारण से ही ‘प्रेय’ से बचने तथा श्रेय की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी है। प्रेय का-साधन का-सदुपयोग किया जाय, किन्तु लक्ष्य हो शाश्वत आनन्द की -शान्ति-सन्तोष की प्राप्ति करना। जीवन लक्ष्य को यदि भुला दिया गया, भौतिक आकर्षण को लक्ष्य माना गया तो जीवन-सम्पदा का यह दुरुपयोग ही होगा।


<<   |   <   | |   >   |   >>

Write Your Comments Here:


Page Titles