कलंकित और लज्जित न हो जाय (kahani)

October 1979

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मेरे पूर्वजों ने अपने पराक्रम और परिश्रम से जिस मातृ-भूमि का श्रृंगार किया, वह मातृभूमि आज मेरे पौरुष की अपेक्षा करती है। तो क्या मुझे उसके लिए क्षण भर की भी देरी करना चाहिये? मेरे पूर्वजों ने जिस भारतभूमि को अपन बलि की खाद से सदा वीर-प्रसूता बनाये रखा, वह मातृभूमि आज मेरे रक्त का अभिसिंचन चाहती है तो क्या मुझे उसके लिए क्षण भर की देरी करनी चाहिये?

मेरे बाद मेरी जाने वाली पीढ़ियां मेरी मातृभूमि के जिस रूप में दर्शन करना चाहती है, जिस श्रद्धा से उसे पूजना चाहती हैं, जिस पौरुष से उसके रक्षार्थ बलिदान होना चाहती हैं, यदि मैं। अपनी मातृभूमि का वैसा पूज्य वेष अपनी सर्वोपरि पूजा, सर्वस्व अर्पण और सर्वोच्च बलिदान से न बनाऊँ तो क्या मैं अकेला ही इतना बड़ा कलंक न बन जाऊँगा कि सारा मानव - समाज ही सदा के लिए उससे कलंकित और लज्जित न हो जाय?


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