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September 1976

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कला की सार्थकता इसमें नहीं कि वह कुछ क्षण तक विनोद की मनःस्थिति उत्पन्न कर दे। जो कला अन्तरात्मा का स्पर्श न कर सके वह क्षणिक उत्तेजना देकर स्थायी थकान देने वाली मदिरा के समान है। उद्वेग और आवेशों के जलते-झुलसते मनुष्य को भावभरी सदाशयता की शीतल छाया में बिठा सकना यह कला का उद्देश्य है और यही होना भी चाहिए।

-सामरसेट माम

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