चेतना का अस्तित्व और अनुभूति

March 1969

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आत्मा एक अखण्ड, अदृश्य पदार्थ है, जो हृदय या मस्तिष्क में कहीं निवास करता है। उसका आकार उस स्थान के आकार जैसा है। अणुमात्र होने पर भी वह सम्पूर्ण शरीर पर आधिपत्य रखता है।

आत्मा अविनाशी तत्त्व हैं, वह कभी निष्क्रिय नहीं रहता। यहाँ तक कि शारीरिक तत्त्व तब शिथिल पड़ जाते हैं और मनुष्य सो जाता है, तब भी वह जागृत रहता है। वह सनातन जागृत और चेतन तत्त्व है, जो खाता-पीता बात करता, दुःख-सुख की अनुभूति आदि विभिन्न क्रियाओं का स्वामी है।

जिस प्रकार शरीर बढ़ता और विकसित होता है। उसी प्रकार आत्मा बढ़ती और विकसित होती है। अच्छी तरह नियम और संयम पूर्वक रखने से जिस तरह शरीर की शक्ति, सौंदर्य और बल बढ़ता है, उसी प्रकार भावनाओं के परिष्कार के द्वारा आत्मा भी बलवान बनती है, अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेने वाली जीव रूपी आत्मा ही परमात्मा बन जाती है।

आत्मा एक अखण्ड अमूर्तिक पदार्थ है, जो शरीर में भी व्याप्त है और शरीर के बाहर निखिल ब्रह्माण्ड में भी। इसलिए वह शरीर की ही नहीं जानता शाश्वत जगत में जो कुछ हो रहा है, जो कुछ होने वाला है, वह सब जानता है, यदि उस पर पाप और मलिनता का पर्दा, इच्छा और आसक्ति की चादर न पड़ी हो।

यह मान्यतायें भारतीय दर्शन की आत्मा के प्रति आदिकाल से चली आ रही हैं। भारतीय संस्कृति और हमारे जीवन का सम्पूर्ण क्रिया-कलाप इसी अन्तर्दर्शन पर आधारित रहा है। इसलिए हम शेष जगत से भिन्न प्रतीत हुये। हमारा जीवन-दर्शन दूसरों से विलगकोटि का रहा।

यद्यपि अब सारा संसार ही उन सूक्ष्म मान्यताओं पर उतर रहा है पर बीच में भौतिक विज्ञान के विकास ने हमारी मान्यता का खण्डन भी किया और उपहास भी। किन्तु आज वही विज्ञान गहराइयों में धँसता-धँसता अब यह भूल रहा है कि भौतिक पदार्थ ही सब कुछ नहीं है। अब वह भारतीय मान्यता की ओर झुकने को विवश है।

पृष्ठ 142 में ‘इन्ट्रोडक्सन टू साइन्स” में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जे. ए. थामसन ने लिखा है - “पृथ्वी पर जीवन का प्रारम्भ कैसे हुआ, इसका कोई उत्तर विज्ञान के पास नहीं है।” ‘मिस्टीरियस यूनिवर्स’ के लेखक सर जेम्स जोन्स को भी कहना पड़ा - “आजकल इस बात में बहुत अधिक लोग सहमत हैं कि ज्ञान की सरिता अयांत्रिक वास्तविक तत्त्व की ओर बह चली है। अब विश्व यन्त्र की अपेक्षा विचार के अधिक समीप लगता है। मन ऐसी वस्तु दिखाई नहीं पड़ता, जो जड़ की दुनियाँ में अकस्मात् टपक पड़ा हो।” ठीक इसी से मिलते-जुलते विचार डा. टेंडल ने भी व्यक्त किये हैं।

दिन माडर्न रिव्यू कलकत्ता के जुलाई 1936 अंक में सर ए. एस. एडिगृन ने लिखा है- “हम नहीं जानते वह क्या है पर कुछ अज्ञात शक्ति काम कर रही है। मैं चेतना को मुख्य मानता हूँ, भौतिक पदार्थ को गौण। पुराना (नास्तिकवाद चला गया। धर्म, आत्मा और मन का विषय है, वह किसी प्रकार हिलाया नहीं जा सकता।”

इन सब उक्तियों के बाद भी आज का अर्द्धराध और पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित समाज चेतना को मानने के लिए तैयार नहीं। क्योंकि वह वस्तुस्थिति से अपरिचित है। आइन्स्टाइन जी विज्ञान का पारंगत पण्डित था मानता है कि सृष्टि में कोई चेतना काम कर रही है पर तो भी विज्ञानवादी उसे मानने के लिए तैयार नहीं होते, तब यह कहना पड़ता है कि क्या यह घटनायें भी आत्मा की उन मान्यताओं को पुष्ट नहीं करती जिनका विवरण ऊपर दिया गया है।

लन्दन के एक निवासी के सम्बन्ध में कुछ वर्ष पूर्व समाचार आया था कि 76 वर्षीय एक व्यक्ति की निद्रा 18 वर्ष की आयु में किसी रोग के कारण भंग हो गई थी और उसके बाद सारे जीवन अर्थात् 58 वर्षों तक उसे निद्रा नहीं आई। उस व्यक्ति के शरीर या मस्तिष्क में कोई रोग या असाधारण जैसा कोई चिह्न भी परिलक्षित नहीं हुआ अर्थात् वह इतने वर्ष लगातार न सोने पर भी पूर्ण स्वस्थ था।

स्पेन के बैलेन्टिन मेडिना नामक एक और सज्जन हैं, जिन्होंने पिछले 62 वर्ष से सोना तो क्या झपकी भी नहीं ली। उन्हें यह भी याद नहीं है कि उन्होंने कभी जम्हाई ली भी थी या नहीं। वे चौबीसों घण्टे काम करते हैं। अर्नेस्टो मेडार्ज के कृषि फार्म में वे पहले 16 घण्टे हल चलाते, निराई करते हैं। शेष 8 घण्टे चौकीदारी करते हैं। जहाँ एक मजदूर कुल आठ घण्टे की मजदूरी कमाता है, वहाँ श्री वैलेन्टिन तीन पाली काम की मजदूरी प्राप्त करते हैं। वे प्रतिदिन दो-बार नाश्ता और चार बार भोजन करते हैं। थक जाते हैं तो उनके लिये बैठकर थोड़ा आराम करना काफी है, सोते तो वे हैं ही नहीं। उनके पास आज तक सोने का कोई बिस्तर भी नहीं है। इस असाधारण स्थिति की जाँच दुनियाँ भर के डाक्टर कर चुके। गोलियाँ, इंजेक्शन और औषधियाँ भी दी गईं पर कोई अन्तर न पड़ा। डाक्टरों ने उनकी मृत्यु के बाद की परीक्षा के लिए अनुमति भी माँगी है और स्पेन के मेडिकल स्कूल को यह अधिकार दे दिया गया है। किन्तु मस्तिष्क की अहर्निश इस जागृत अवस्था का कोई निश्चित निष्कर्ष वैज्ञानिक और डाक्टर न निकाल पाये।

यह दोनों घटनायें आत्मा के एक चिर जागृत तत्त्व होने का ही प्रमाण हैं। जिसका न कोई डाक्टर खण्डन कर सका है और न वैज्ञानिक। न ही उनके पास इसका कोई निश्चित उत्तर है।

पूर्व ज्ञान भी उसी प्रकार शारीरिक और यांत्रिक प्रक्रियाओं की सीमा में नहीं आया और न ही विज्ञान इस बात का कोई उत्तर दे सका कि हृदय में आई हुई कई बातें भविष्य में सच सच घटित हो जाती हैं, उसका रहस्य क्या है। सुकरात कहा करते थे- ‘मेरे अन्दर एक ‘डेमन’ (आत्मा) का वास है, वह मुझे होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास करा देती हैं” यह सच था कि सुकरात अनेक रहस्यपूर्ण बातों की जानकारी पहले ही दे दिया करते थे। एक बार सुकरात अपने अनुयायियों के साथ एक सड़क पर जा रहे थे। वे अचानक एक स्थान पर रुके और कहा- “मेरा डेमन कहता है कि इस सड़क से नहीं चलना चाहिये। गन्तव्य तक पहुँचने के लिए दूसरे रास्ते से चलेंगे। रास्ते में कोई खतरा है।”

‘दे जेनियो सोक्रेटीज’ में लिखा है कि - इस बात पर जिन्होंने विश्वास कर लिया वे सुकरात के साथ दूसरे रास्ते से चले गये पर चेरिलस और कुछ दूसरे लोगों ने कहा - यह सब बेकार की कल्पना है और वे उसी रास्ते गये। थोड़ी ही दूर पहुँचे होंगे कि जंगली सुअरों के एक झुण्ड ने उन पर आक्रमण कर दिया। कई कोई चोटें आई, कई को सुअरों ने रौंद डाला, बड़ी मुश्किल से सुकरात के पास पहुँच पाये।

प्लेटो ने भी अपनी एक थीसिस में ऐसी ही एक घटना का उल्लेख किया है। सुकरात भोजन कर रहे थे। तिमार्कस नामक युवक भी उनके पास था। वह उठकर कहीं जाने को हुआ तो सुकरात ने फिर वही बात दुहराई - मेरा डेमन कहता है कि तुम्हारा यहाँ से जाना खतरे से खाली नहीं है। पर तिमार्कस ने अनसुनी कर दी। उसके कुछ मित्रों ने कोई षड्यन्त्र रचा था, तिमार्कस गया तो उन्हीं के साथ हो गया और एक व्यक्ति की हत्या कर दी, उसी अपराध में उसे भी प्राणदण्ड दे दिया गया।

आत्मा का एक गुण यह है कि वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, यह बात थोड़ी कम समझ में आती है पर तात्त्विक दृष्टि से चिन्तन करने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है। पदार्थ की तीन अवस्थायें साधारणतया सबको ज्ञात हैं - (1) घन (पत्थर की तरह कड़ी), (2), द्रव, (3) गैस। लोहा घन है पर उसे तेज आँच दें तो वह पिघल कर द्रव में परिणत हो जाता है। ज्यादा गर्मी दी जाये तो वही भाप बन जायेगा। यही अवस्था दूसरे पदार्थों की भी है। मूलतः जड़ और चेतन दो ही अणु काम करते हैं, जहाँ अणु ढेर हो जाती है वहीं घनत्व दिखाई देने लगता है। जहाँ चेतन अणु जितने पदार्थ रहित (इच्छा रहित) होंगे, वहाँ उतनी ही सूक्ष्म दृष्टि होगी। भले ही हम उस तत्त्व को इन आँखों से न देख पायें।

अब इन तीन अवस्थाओं के आगे की चौथी अवस्था भी जानी गई है, वह है ईश्वर तत्त्व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला है और रेडियो सन्देशों को तार की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा देता है। आपका चित्र इस पृथ्वी के नीचे वाले आसमान में भी विद्यमान् हैं, यदि यह कहा जाये तो चौंके नहीं, क्योंकि ईश्वर के परमाणु आपको घेरे हैं। इस तरह जहाँ तक भी ईथर फैला हुआ है, वहाँ तक आपका फोटो उन परमाणुओं के माध्यम से बह रहा है, जिसे आवश्यकता होती है वह आपको कहीं भी देख लेता है। वैसे सामान्य स्थिति में सबके चेहरे उपेक्षित लहर लेते रहते हैं।

अब ईथर के भी 7 खण्ड किये गये हैं। अर्थात् पदार्थ की सात अवस्थायें ईश्वर से आगे भी हैं। अंग्रेजी में उन्हें एस्ट्रल कहते हैं और हम भारतीय उन्हें लोक कहते हैं और यह मानते हैं कि इन सात अवस्थाओं में जिसे जिस तरह की अवस्था प्राप्त हो जाती है, वह उसी लोक की अनुभूति करने लगता है। इन अवस्थाओं से संपर्क का लाभ ईथर में प्रवाह की तरह होता है, अर्थात् वह मनुष्य कहीं भी दूर की सुन सकता है और देख भी सकता है। वहाँ की परिस्थितियों का रसास्वादन भी कर सकता है।

सेनेवा कोलम्बस से 1500 वर्ष पूर्व जन्मा था, किन्तु उसने तभी यह भविष्यवाणी कर दी थी कि एक दिन पृथ्वी में कभी ऐसे आयुधों का आविष्कार होगा, जिसके बारे में कल्पना करना भी कठिन है। प्रसिद्ध चित्रकार लियोनार्दो द विंची ने आज से 400 वर्ष पूर्व ही यह बता दिया था- आगे लोग आकाश में उड़ा करेंगे। इनसे भी महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणी जानेथन स्विफ्ट की है। जानेथन ने ‘गुलिवर की भ्रमण कथा’ में एक लापुटा नाम द्वीप का चित्रण किया है। उसी में बताया है कि मंगल ग्रह के चारों और दो चन्द्रमा चक्कर लगाया करते हैं, उनमें से एक चन्द्रमा दूसरे से दुगुनी तेज गति से चक्कर लगता है। उस समय उस बात को गप्प कहा जाता था, किन्तु 1877 में अमेरिका की नावल आब्जरबेटरी ने एक शक्तिशाली दूरबीन के द्वारा यह पता लगाया कि यथार्थ ही मंगल ग्रह में दो चन्द्रमा हैं, उनमें एक की गति दूसरे से दुगुनी है। स्विफ्ट ने बिना किसी यन्त्र के यह कैसे जान लिया इसका उत्तर माँगा जाय तो विज्ञान के पास सिवाय चुप्पी के और कोई उत्तर न होगा।

ऐसी घटनाओं की कमी नहीं है जिनसे आत्मा के एक विचित्र ‘क्रिस्टल’ होने की बात सत्य सिद्ध होती है, हिप्नोटिज्म, विचार, प्रेषण, दूरदर्शन, दूर श्रवण और स्वप्नावस्था में भी जागृत अनुभूतियाँ इस बात की प्रमाण हैं कि शरीर में किसी अणु आत्मा का निवास अवश्य है, उसी का संकेत करते हुए मैत्रायण्युपनिषद् के पंचम प्रपाठक में बताया गया है -

द्विषा या एष आत्मानं विभर्त्ययं यः प्राणी यश्चासावा दित्योथ द्वौ या एतावास्तां पन्जघा नामर्न्तवहिश्चाहोरात्रे तौ व्यावर्तते असौ वा आदित्यो बहिरातमन्तरामा

- एवाश्रितोन्नमत्ति॥1॥

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के दो शिष्यों में विवाद छिड़ गया कि उनमें बड़ा कौन है? अन्त में दोनों स्वामी जी के सम्मुख गये। स्वामी जी ने उत्तर दिया - “बड़ा सरल हल है, तुममें से जो दूसरे को बड़ा समझे वही बड़ा है।” अब तो विवाद का स्वरूप ही बदल गया। दोनों एक दूसरे को ‘तू बड़ा, तू बड़ा’ कहने लगे।

अर्थात् - “वह परमात्मा दो प्रकार की आत्माओं (स्वरूपों) को धारण करता है, यह जो प्राण है और सूर्य है, ये दोनों प्रथम हुये थे। वे भीतर और बाहर दिन रात फिरा करते हैं, वह सूर्य बाहर का अन्तरात्मा है और प्राण अन्तरात्मा है। इसकी गति को देखकर यह अनुमान किया जा सकता है कि यह आत्मा है। वेद कहते हैं कि यह गति रूप ही है, जिस विद्वान् के पाप नष्ट हो चुके हैं। वह सब का अध्यक्ष होता है, उसका मन शुद्ध होता है, उसकी निष्ठा परमात्मा में ही होती है। उसका ज्ञान-चक्षु खुल जाता है और अन्तरात्मा में ही स्थित रहता है। वह गति द्वारा बाहर भी चला जाता है, आत्मा की गति का अनुमान किया जा सकता है, ऐसा वेद कहते हैं।


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