मानसिक शक्ति बढ़ाने के कुछ उपाय

February 1956

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(श्री आनन्द जी टीकापट्टी)

शक्ति, बल का सूचक है। बल या शक्ति मूलतः एक ही है, किन्तु ‘करण’ भेद से उसके रूप और नाम में भेद और अनेकतायें उत्पन्न हो जाती हैं, जैसे आध्यात्मिक बल, बौद्धिक शक्ति, नैतिक बल, मानसिक बल, शारीरिक बल, प्राणशक्ति आदि-आदि। किन्तु अभी तक मानव का विकास ‘नव-तत्व’ तक ही होने से, यही इसका प्रधानबल कहा जाता है, यद्यपि भारत की विकसित विचारधारा ने आध्यात्मिक बल को ही सर्वोच्च बल स्वीकार किया है और इस बल या सम्पूर्ण बलों का एकमात्र केन्द्र आत्मा या परमात्मा है, यहाँ की संस्कृति एवं ज्ञान को एकमात्र यही निश्चय और निर्णय सन्तुष्टि और सत्याधार प्रदान करता है।

चूँकि साधारणतया मानव-जीवन का प्रधान सञ्चालन मन-बुद्धि के द्वारा ही हम होते देखते हैं, इसीलिये मनोबल पर ही यहाँ विचार किया जा रहा।

मन और बुद्धि में भी थोड़े भेद हैं। संकल्प-विकल्प शक्ति वाला ‘करण’ मन है और उसे निश्चयता-स्थिरता प्रदान करने वाला तत्व ‘बुद्धि’ नाम से अभिहित है। यहाँ मनस्तत्व में मन और बुद्धि को एक साथ ही ले लिया गया है।

अब सोचना है कि ‘मन’ में ये बल कहां से और कैसे आते हैं?

विचारकों का कथन है कि एकाग्रता से मन में शक्ति आती है। विचार करने से लगता है कि मन की एकाग्र दशा में अवश्य ही शक्ति, या शक्तियों का प्रवेश मन में होने लगता है, किन्तु इससे यह पता नहीं लगता कि इसका केन्द्र भी मनः स्तर ही है। मन की एकाग्र स्थिति में होता यही है कि मानसिक चेतना की बिखरी हुई शक्तियाँ एकत्रित और एकीभूत होकर एक बड़ी और विशाल मानसिक शक्ति बन जाती है पर वह चेतना तो मन का निजी स्वत्व नहीं है, जिस पर उसका पूरा-पूरा अधिकार हो। फिर भी यह एक सत्य है कि मन की एकाग्र दशा में उसका बल अवश्य ही बढ़ने लगता है। जितना ही अधिक यह एकाग्र होता है उतना ही अधिक बलशाली होता जाता है, ऐसा अनेकों का अनुभव है। उक्त अनुभव पर हम यह भी जान सकते हैं कि जितना ही यह (मन) बिखरता है—विभिन्न इच्छाओं-विचारों और कामनाओं का संचरण और गति करता है, उतना ही यह निर्बल और क्षीणशक्त वाला होता जाता है। इसीलिये चिन्ता करने वाले, मन को स्थिर और शान्त रखने में असमर्थ व्यक्ति किसी काम को लगन के साथ नहीं कर पाते। वह जो कुछ काम करता है खण्डित मन से करता है। मन की चंचल गति उस कार्य की सफलता पर विश्वास नहीं करने देती। परिणाम होता है कि कार्य की विफलता के साथ ही उसकी शक्ति भी व्यर्थ खर्च हो जाती है और यह असफलता का आधान उसकी अवशिष्ट शक्तियों को भी क्रमशः क्षीण और निरुत्साहित करता रहता है।

एकाग्र मनोदशा में जो मानसिक बलों की अभिवृद्धि होती है, उसका बल का केन्द्र कहाँ है, इसे तो हम साधारण विचार से नहीं देख सकते, पर हम अनुभव तो ले ही सकते हैं, कि मन की एकाग्र और प्रशान्त दशा उसकी बलवृद्धि का कारण है। गीता के छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि यद्यपि मन को रोकना, वायु को रोकने के सदृश दुष्कर है, किन्तु ऐसा बिना किये योग में सफलता पाने का भी तो उपाय नहीं है। इसे रोकने के लिये अभ्यास और वैराग्य को वहाँ आवश्यक साधन के तौर पर समुपस्थित किया है।

कुछ वर्तमान मनोवैज्ञानिक विचारकों ने ‘शिथिलीकरण’ के अभ्यास तथा मन को रचनात्मक कामों में लगाने से, मानसिक शक्ति के ह्रास को रोकने का साधन भी माना है। उनका कहना है—

मानसिक शक्ति बढ़ाने के दो उपाय हैं:—एक वर्तमान शक्ति को विनष्ट होने से रोकना और दूसरा नई शक्ति की प्राप्ति की चेष्टा करना। वर्तमान मानसिक शक्ति का विनाश मन को रचनात्मक काम में लगाने और “शैथिलीकरण” (शिथिलीकरण) के अभ्यास से रोका जा सकता है। सम्मेलन से ही अधिक सफलता प्राप्त होती है। जब मनुष्य किसी कार्य में सफल हो जाता है तो उसका आत्म विश्वास बढ़ जाता है। आत्मविश्वास की वृद्धि, चरित्रनिर्माण का केन्द्र है। अपना काम मनुष्य का आत्म विश्वास बढ़ाता है और उसकी ख्याति उसका अभिमान बढ़ाती है। आत्मविश्वास सब प्रकार की सफलता का श्रोत है और ख्याति मनुष्य की विनाशक है। जब मनुष्य में ख्याति से दम्भ आ जाता है तो उसकी ख्याति ही उसे खा जाती है। अतएव मनुष्य को सदा रचनात्मक काम में लगे रहना चाहिये। रचनात्मक कार्य वह है, जिससे किसी प्रकार अपना और दूसरे लोगों का कल्याण हो, जिसके करने के पश्चात् आत्मग्लानि न होकर आत्म प्रसाद की अनुभूति हो।

मानसिक शक्ति की वृद्धि, उसका अपव्यय रोकने से भी होती है। मानसिक शक्ति का अपव्यय सदा संकल्प-विकल्प को चलते रहने देने से होता है। इनको रोकने के लिये शैथिलीकरण का अभ्यास करना आवश्यक है। शैथिलीकरण का अभ्यास शरीर से आरम्भ करके मन की ओर बढ़ाया जा सकता है।

“नई मानसिक शक्ति का उत्पादन अपने आदर्श पर मनन करने से होता है। जो मनुष्य जितना ही अधिक अपने आदर्श के विषय में चिन्तन करता है वह उतना ही अधिक मानसिक शक्ति को बढ़ा लेता है।”

“मनुष्य की शक्ति उसके आदर्श स्वत्व की शक्ति है। यदि मनुष्य का वर्तमान स्वत्व नीचा है, परन्तु यदि उसका आदर्श स्वत्व ऊँचा है तो वह व्यक्ति एक दिन अवश्य महान व्यक्ति हो जावेगा।”

“मनुष्य की सभी शक्ति समष्टि भाव की शक्ति है। जब तक मनुष्य अपने आप को भुलाये रहता है और समष्टि के हित के लिये चिन्तन करता है तब तक वह अपने में असीम शक्ति पाता है, परन्तु जब वह इस शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ साधन के लिये करने लगता है तो वह अपना विनाश कर लेता है।......... अपने आपको भुलाने से मनुष्य अपना परमात्मा से ऐक्य कर देता है। तब वह शक्तिवान हो जाता है।”

उपर्युक्त उद्धरणों से मन को शक्तिशाली बनाने के निम्नलिखित साधन जानने में आते हैं।

1—शिथिलीकरण का अभ्यास।

2—रचनात्मक कामों में सदा लगे रहना।

3—आदर्श का चिन्तन और मनन करना।

4—व्यष्टि भाव भुलाकर समष्टि भाव में डूबना।

ये सभी साधन स्वभावतः ही अभ्यास और वैराग्य में आ जाते हैं। बिना इन दोनों का उपयोग किये सफलता और सिद्धि सदा दूर ही रहेगी।

अब एकबार जरा गम्भीरता से सोचें।

शिथिलीकरण:—शिथिलीकरण की सिद्धि एक ऐसी सिद्धि है कि योगीगण कहते हैं—इससे 6-7 घन्टे नीन्द का लाभ छह सात मिनट में लिये जा सकते हैं।

शरीर को चुपचाप छोड़ देना ही शिथिलीकरण नहीं है। मन और प्राण की चञ्चलता, शरीर को सदा तनाव की दशा में रखती है अतः मन और प्राण को बिना शान्त किये शरीर शिथिल हो ही नहीं सकता। मन प्राण एवं शरीर के शान्त होते ही विश्व व्यापिनी प्राणशक्ति उसी भाँति शरीर में प्रविष्ट होने लगती है, जिस भाँति नल खोल देने से जल की धारा अप्रतिहत गति से बहने लगती है। शरीर मन, प्राण सभी शक्ति से परिप्लावित हो जाते हैं।

2—रचनात्मक कामों में सदा लगे रहना।

हम जैसा बनना चाहते हैं शरीर मन बुद्धि से सदा वैसे ही कामों में लगे रहना ही रचनात्मक कार्य में लगे रहना है। इसी बारम्बार के प्रयत्न—अभ्यास द्वारा ही नवीन-उत्कृष्ट स्वभाव वृत्ति और कार्य बनाये जा सकते हैं।

3—आदर्श का निरन्तर चिन्तन और मनन।

वेदान्त में भृंगी और कीट का उदाहरण सवा प्रसिद्ध है। कीट चिन्तन करता-करता अन्त में भृंगी ही बन जाता है। अतः आदर्श के सदैव चिन्तन-मनन से सभी वैसे अवश्य ही हो सकते हैं।

4—व्यष्टि भाव को भूल कर समष्टि भाव में तल्लीन होना।

यह विचार तीसरे विचार का परिपूरक है। कीट यदि अपनी आकृति की ही याद रक्खे तो वह कभी भृंगी नहीं बन सकेगा। अतः हम अपने को अपने आदर्श में विलीन करके ही वैसा बन सकते हैं इसमें कोई सन्देह नहीं है।

तो अपने मानसिक शक्ति की अभिवृद्धि के लिये ये सब अभ्यास उपयोगी हैं, पर अभ्यास के साथ वैराग्य को क्यों परिपूरक स्थान दिया गया है?

हमारा युग-युग का स्वभाव रहता आया है विषयों की ओर खिंचते रहने का। यदि हम इस राग का परित्याग नहीं करें तो सूखा-प्राण विहीन अभ्यास ही केवल नवीन, उन्नत स्वभाव, वृत्ति का निर्माण कदापि नहीं कर सकता। अभ्यास यदि शरीर है तो वैराग्य उसका प्राण। दोनों के समुचित समन्वय से ही मनोबल की प्राप्ति या अन्य उत्कृष्टतर सिद्धियाँ उपलब्ध की जा सकती हैं।

अब अन्त में हम केन्द्रीय-विषय पर विचार कर लें। “यह तो हम जान सके कि मन की एकाग्र या शान्त दशा ही उसके लिये शक्ति संग्रहण की उपयुक्त स्थिति है। पर ये शक्तियाँ आती कहाँ से हैं? क्या मनस्तत्व में ही इसका निवास-केन्द्र भी है?

उपनिषद् में कहा है—मन जिसका मनन नहीं कर पाते, पर स्वयं मन ही जिसके द्वारा मनन कर लिया जाता है, वही ब्रह्म है।

यही ब्रह्म सर्व शक्तियों का धाम है। जितना ही शान्त, नीरव, एकाग्र और स्थिर हम अपने मन-प्राण शरीर का रख सकेंगे, उतना ही मात्रा में हम उनसे शक्ति ग्रहण कर सकेंगे। पर सर्वोच्च दशा में तो अपने शरीर-प्राण-मन को उसी में विलीनित कर हम स्वयं सर्वशक्ति धाम परब्रह्म बन जाते हैं।


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